कार्ल मार्क्स का जीवन परिचय और कार्ल मार्क्स का जन्म कब हुआ था।
कार्ल मार्क्स के विचार और कार्ल मार्क्स का संबंध है आइये इसके बारे में जानते है?
मार्क्स का जन्म 6 मई, 1818 को जर्मनी के राइन प्रान्त के ट्रीविज (Treves) नगर में हुआ था। मार्क्स की स्कूली शिक्षा ट्रीविज नगर में हुई। 1838 ई. में स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए बोन विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। उन्होंने 1841 ई. में दर्शनशास्त्र से डॉक्टरी की डिग्री प्राप्त की।
1842 ई. में राइन समाचार-पत्र में लेखन का कार्य प्रारम्भ किया, परन्तु प्रशा सरकार के विरुद्ध कुछ लेख लिखने के कारण मार्क्स को यह समाचार पत्र छोड़ना पड़ा। मार्क्स की पत्नी का नाम जेनी था। 1847 ई. में ब्रसेत्ज में स्थापित कम्युनिस्ट लीग और क्षेत्रीय समिति के नेतृत्व की जिम्मेदारी मार्क्स को सौंपी गई।
1848 ई. में कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र प्रकाशित हुआ। घोषणा-पत्र के अन्त में कहा गया है "कम्युनिस्ट क्रान्ति के डर से शासक वर्ग को काँपने दो मजदूरों के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है।" मार्क्स ने कहा, “क्रान्ति इतिहास का इंजन है।" बेल्जियम से भी मार्क्स को क्रान्तिकारी विचारों के कारण निष्कासित होना पड़ा। इस कारण उनके जीवन में अस्थिरता के साथ आर्थिक तंगी भी आ गई थी। 1850 ई. में मार्क्स के पुत्र की मृत्यु तथा 1852 ई. में पुत्री की मृत्यु हो गई थी।
इसे भी जानें - दुर्खिम का सिद्धांत
1867 ई. में कार्ल मार्क्स की कृति 'दास कैपिटल' का प्रथम खण्ड जर्मन भाषा में प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने पूँजीवाद का बड़ा गम्भीर विश्लेषण किया है तथा इस मान्यता को बल देकर प्रतिपादित किया है कि मनुष्य के अस्तित्व को उसकी चेतना निर्धारित नहीं करती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है। कैपिटल के दो शेष खण्डों को एंगेल्स ने पूर्ण किया था। दिसम्बर, 1864 में लन्दन में प्रथम 'अन्तर्राष्ट्रीय वर्किंग एसोसिएशन' (पहला इण्टरनेशनल) हुआ। इसमें कई देशों के मजदूर नेताओं ने भाग लिया। इसमें मार्क्स ने भी भाग लिया जिसकी जनरल काउंसिल में उन्हें पहले ही चुना गया था।
इस संगठन में मार्क्स, इमाइल दुर्खीम की अराजकतावादी विंग के संघर्ष में शामिल हुए थे। 1881 ई. में मार्क्स की पत्नी का निधन गया। बुढ़ापे, बीमारी और आर्थिक अभाव ने मार्क्स को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित किया। 14 मार्च, 1883 को उनका निधन हो गया।
कार्ल मार्क्स मराठी कविता
कार्ल मार्क्स-नारायण सुर्वे
नारायण सुर्वे
माझ्या पहिल्या संपातच
मार्क्स मला असा भेटला.
मिरवणुकीच्या मध्यभागी
माझ्या खांद्यावर त्याचा बॅनर होता.
जानकी अक्का म्हणाली, ‘वळिखलंस ह्याला –
ह्यो आमचा मार्कसबाबा
जर्मनीत जलमला, पोताभर ग्रंथ लिवले
आणि इंग्लंडच्या मातीला मिळाला.
‘सन्याषाला काय बाबा
सगळीकडची भूमी सारखीच
तुझ्यासारखी त्यालाही चार कच्चीबच्ची होती.’
माझ्या पहिल्या संपातच
मार्क्स मला असा भेटला.
पुढे एका सभेत मी बोलत होतो,
– तर या मंदीचे कारण काय
दारिद्र्याचे गोत्र काय
पुन्हा मार्क्स पुढे आला; मी सांगतो म्हणाला,
आणि घडाघडा बोलतच गेला.
परवा एका गेटसभेत भाषण ऐकत उभा होता.
मी म्हणालो –
‘आता इतिहासाचे नायक आपणच आहोत,
यापुढच्या सर्वच चरित्रांचेही.’
तेव्हा मोठ्याने टाळी त्यानेच वाजविली
खळखळून हसत, पुढे येत;
खांद्यावर हात ठेवीत म्हणाला,
‘अरे कविता-बिविता लिहितोस की काय
छान, छान.
मलासुद्धा गटे आवडायचा.’
मार्क्स की रचनाएँ
- द पॉवर्टी ऑफ फिलॉसफी, 1844
- द इकोनॉमिक एण्ड फिलोसॉफिकल मेन्युसिक्रिप्ट, 1844
- द कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो, 1848
- द क्रिटिक ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी, 1859
- वेल्यू प्राइज एण्ड प्रोफिट, 1865
- द सिविल वॉर, 1871 कैपिटल वॉल्यूम-I, II, III, 1894
- क्लास स्ट्रगल इन फ्रांस
- द गोथा प्रोग्राम
- द हॉली फैमिली, 1875
- द जर्मन आइडिओलॉजी
- द कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो
- ऑन इण्डिया
मार्क्स के विचारों के स्रोत (Sources of Ideas of Marx )
- जर्मन विद्वानों का प्रभाव मार्क्स ने समाज के विकास के लिए हीगल द्वन्द्वात्मक पद्धति को अपनाया। उन्होंने युवा हींगलवादी फायरबाख से भौतिकवाद का विचार लिया। ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों का चिन्तन मार्क्स ने ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों एडम स्मिथ, रिकार्डों आदि से श्रम के मूल्य सिद्धान्त को अपनाया। इसी म मूल्य सिद्धान्त के आधार पर उन्होंने अधिशेष मूल्य का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
- फ्रेंच समाजवादियों का चिन्तन फ्रांस में सेण्ट साइमन चार्ल्स फोरियर आदि चिन्तकों ने जिस समाजवाद का प्रतिपादन किया था, उसका स्वय यद्यपि काल्पनिक था, तथापि वह अपने चरित्र में क्रान्तिकारी था। उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व का सिद्धान्त श्रमिकों का उत्थान और उनका शोषण करने वाले वर्ग के विनाश का सिद्धान्त और वर्गविहीन समाज (जिसमें केवल सर्वहारा वर्ग हो) की स्थापना का विचार आदि मार्क्स में फ्रांसीसी चिन्तन से ही ग्रहण किए थे।
- सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ तत्कालीन पूँजीवाद समाज के शोषणवादी चरित्र ने भी मार्क्स को क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया। मैक्सी ने ठीक ही लिखा है, मार्क्स के चिन्तन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण बात उसकी मौलिकता नहीं है वरन् उसकी समन्वयकारी शक्ति है।” उसने सामग्री को कई स्थानों से एकत्रित कर उसे एक सिद्धान्त का रूप दिया, जिससे सर्वहारा आन्दोलन के सिद्धान्त का निर्माण हुआ।
संक्षेप में, यह कहा जा सकता है मार्क्स ने चाहे ईंटों को बहुत-से स्थानों से एकत्र किया हो, परन्तु उसने साम्यवाद का जो विशाल भवन बनाया, वह नर्वथा मौलिक है। मार्क्स ने साम्यवाद को वैज्ञानिक रूप प्रदान किया, इसी कारण उसे 'वैज्ञानिक समाजवाद का जनक' कहा जाता है।
मार्क्स के कल्पनामूलक समाजवादी (Marx Imaginative Socialist)
कार्ल मार्क्स के पूर्ववर्ती समाजवादी सेण्ट साइमन, चार्ल्स फोरियर और रॉबर्ट ओवेन को कल्पनामूलक समाजवादी कहा जाता है। जिनका विवरण इस प्रकार है।
मार्क्स का वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism of Marx )
सर्वहारा समाजवाद (Proletarian Socialism) तथा वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) के नाम से जात मार्क्सवादी समाजवाद को मार्क्स इसलिए वैज्ञानिक कहता है कि यह इतिहास के अध्ययन पर आधारित है। उससे पहले साइमन फोरियर तथा ओवेन का समाजवाद वैज्ञानिक इसलिए नहीं था, क्योंकि वह इतिहास पर आधारित न होकर केवल कल्पना पर आधारित था।
मार्क्स का दर्शन बड़ा विराट तथा सुसम्बद्ध है। केटलिन के अनुसार, उसका क्रान्तिकारी कदम वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त पर आधारित है, वर्ग संघर्ष अतिरिक्त मूल्य के आर्थिक सिद्धान्त पर आर्थिक सिद्धान्त इतिहास की आर्थिक व्याख्या पर मार्क्स हीगल के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त पर और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी आध्यात्मिक विधा पर आधारित है।
इस प्रकार स्पष्टतः मार्क्स की विचारधारा के निम्न आधार स्तम्भ है।
- द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद।
- ऐतिहासिक भौतिकवाद द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का पूरक सिद्धान्त।
- अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त।
- वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त।
- मार्क्स का क्रान्ति का सिद्धान्त
ये सभी स्तम्भ, जिन पर मार्क्स ने अपने दर्शन का भवन निर्मित किया है, एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं तथा उसकी विचारधारा की अविभाज्य इकाई हैं। मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें प्रथम शब्द द्वन्द्वात्मक उस प्रक्रिया को स्पष्ट करता है जिसके अनुसार सृष्टि का विकास हो रहा है और दूसरा शब्द भौतिकवाद सृष्टि के मूल तत्त्व को सूचित करता है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त मार्क्स के सम्पूर्ण चिन्तन का मूलाधार है। यह सिद्धान्त भौतिकवाद की मान्यताओं को द्वन्द्वात्मक पद्धति के साथ मिलाकर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या देने का प्रयत्न करता है।
इस सिद्धान्त के प्रतिपादन में मार्क्स ने द्वन्द्ववाद का विचार हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति से ग्रहण किया और भौतिकवाद का दृष्टिकोण फायरबाख से ग्रहण किया। मार्क्स ने इस सिद्धान्त को समस्त साम्यवादियों के लिए एक दिशा-निर्देश यन्त्र की उपमा दी जिसका प्रयोग करके साम्यवादी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन की दिशा निर्धारित कर सकता है।
इसकी सहायता से प्रत्येक साम्यवादी न सिर्फ सही दृष्टिकोण स्वीकार कर सकता है, बल्कि सामाजिक घटनाओं के आन्तरिक सम्बन्धों को भी समझ सकता है और यह जान सकता है कि वर्तमान में उनका विकास किस दिशा में हो रहा है, साथ ही वह यह भी जान सकता है कि भविष्य में उनका विकास किस दिशा में होगा।
द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया
मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति पर आधारित है। हीगल यह मानते चलता हैं कि समाज की प्रगति प्रत्यक्ष न होकर एक टेढ़े-मेढ़े तरीके से हुई है, जिसके तीन अंग हैं-वाद, प्रतिवाद और संवाद। मार्क्स की द्वन्द्वात्मक पद्धति का आधार हीगल का यही द्वन्द्ववादी दर्शन है। हीगल के द्वन्द्ववाद के परिप्रेक्ष्य में मार्क्स के द्वन्द्ववाद को समझा जा सकता है। मार्क्स तथा उसके अनुयायियों ने द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को गेहूं के पौधे के उदाहरण से है। गेहूं का दाना वाद है और भूमि पर बो देने के बाद जब पौधा निकलता है, तो वह दूसरा चरण प्रतिवाद है। तीसरा चरण पौधे में बाली का आना, इसके पकने पर गेहूं के दाने का बनना तथा पौधे का सूखकर नष्ट होना, यह तीसरा चरण संवाद है।
आर्थिक जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के सन्दर्भ में इस द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को इस प्रकार समझाया जा सकता है— पूँजीवाद वाद है, सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतन्त्र की अवस्था प्रतिवाद है और साम्यवाद की अवस्था संवाद है।
भौतिकवाद
जहाँ हीगल सृष्टि का मूल तत्त्व चेतना या विश्वात्मा को मानते हैं, वहीं मार्क्स सृष्टि का मूल तत्त्व जड़ को मानते हैं। मार्क्स के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति जड़ से हुई है। यहाँ तक कि चेतना की उत्पत्ति भी जड़ से हुई है। मार्क्स का जड़ से तात्पर्य भौतिक परिस्थितियों अर्थात् आर्थिक परिस्थितियों से है। मार्क्स के अनुसार आर्थिक सम्बन्धों में महत्त्वपूर्ण उत्पादन प्रणाली है।
जब उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन होता है, तो समाज में भी परिवर्तन होता है। समाज में यह परिवर्तन द्वन्द्वात्मक पद्धति से ही होता है। मार्क्स के अनुसार भौतिक जगत द्वन्द्वात्मक पद्धति के माध्यम से अपनी पूर्णता की यात्रा पर अग्रसर है और उसके विभिन्न रूप उसकी यात्रा के विभिन्न पड़ाव हैं।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएँ
सोवियत रूस के भूतपूर्व (1924-53) सर्वेसर्वा जे स्टालिन के द्वारा अपनी रचना फिलॉसफी ऑफ मार्कसिज्म में द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विस्तार के साथ विवेचना की गई।
मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त
मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त अपनी पुस्तक 'दास कैपिटल' में प्रस्तुत किया। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का गहन विश्लेषण करके मार्क्स ने यह सिद्ध किया कि यह व्यवस्था शोषण पर आधारित है। मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त ही वह सिद्धान्त है जिसके द्वारा उन्होंने स्पष्ट किया कि पूँजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं।
अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त रिकार्डो, स्मिथ जैसे अर्थशास्त्रियों के श्रम सिद्धान्त पर आधारित है।
मूल्य के मार्क्स के शब्दों में श्रमिक जो पैदा करता है और जो प्राप्त करता है, उसका अन्तर ही अतिरिक्त मूल्य है, उदाहरणार्थ- किसी वस्तु की कीमत ₹50 पूँजीपति श्रमिक को इस वस्तु के उत्पादन के लिए मात्र ₹10 देता है शेष ₹40 अपने पास रख लेता है। यह ₹40 ही अतिरिक्त मूल्य है।
मार्क्स के अनुसार, इस अतिरिक्त मूल्य के कारण ही श्रमिक का शोषण होता है। इसी अतिरिक्त मूल्य से ही पूँजीपति पूँजी का एकत्रीकरण करता है। मार्क्स के अनुसार इसी अतिरिक्त मूल्य के कारण ही श्रमिकों की पूँजीपति समाज में दशा दयनीय होती है।
कार्ल मार्क्स के सिद्धांत को समझाइए
मार्क्स द्वारा प्रतिपादित वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त ऐतिहासिक भौतिकवाद की ही उपसिद्धि है और साथ ही यह अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त के भी अनुकूल होती है। मार्क्स ने आर्थिक नियतिवाद की सबसे महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति इस बात में देखी है कि समाज में सदैव ही विरोधी आर्थिक वर्गों का अस्तित्व रहा है। एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व है और दूसरा वह वर्ग है जो केवल शारीरिक श्रम करता है। पहला वर्ग सदैव ही दूसरे वर्ग का शोषण करता है। समाज के शोषक और शोषित ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे हैं और इनमें समझौता कभी सम्भव नहीं देखा गया है।
मार्क्स मुख्य रूप से दो ऐसे वर्गों की कल्पना करता है, जो आधुनिक समाज में सक्रिय राजनीतिक इकाई हैं। इनमें से एक मध्य वर्ग है जो नगरों में रहता है और व्यापार में लगा होता है। यह नागरिक और राजनीतिक स्वतन्त्रताओं में विशेष रुचि लेता है। दूसरा वर्ग औद्योगिक सर्वहारा वर्ग है। यह भी नगरों में रहता है, लेकिन यह वर्ग राजनीतिक स्वतन्त्रता की अपेक्षा आर्थिक सुरक्षा को अधिक महत्त्व देता है। आधुनिक समाज में इन दोनों वर्गों के बीच संघर्ष होता रहता है। मार्क्स की मान्यता है कि अन्ततः इस संघर्ष में सर्वहारा संवर्ग की विजय होगी और उसी वर्ग का आधिपत्य स्थापित होगा।
वर्ग संघर्ष का इतिहास ही मानव जाति का इतिहास है। इतिहास का निर्माण करने वाले राजनीतिक आन्दोलन वर्ग-आन्दोलन होते हैं। प्रत्येक काल में और प्रत्येक देश में ये वर्ग आन्दोलन आर्थिक और राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए निरन्तर महान् आन्दोलनों को जन्म देते रहते हैं। प्राचीन रोम में कुलीन सरदार साधारण मनुष्य तथा दास होते थे। मध्य युग में सामन्त, सरदार, जागीरदार, संघस्वामी कामदार, अपरेन्टिस तथा सेवक होते थे। प्रायः इन समस्त वर्गों में इनकी उपश्रेणियां होती थीं। ये समूह अर्थात् दमन करने वाले तथा दलित, निरन्तर एक-दूसरे का विरोध करते थे। इनमें कभी खुलकर और कभी छिपकर निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। प्रत्येक समय इस युद्ध के परिणामस्वरूप या तो समाज की क्रान्तिकारी पुनर्रचना होती थी या संघर्षरत दोनों वर्ग नष्ट हो जाते थे।
यह उल्लेखनीय है कि मार्क्स ने बुर्जुआ तथा श्रमजीवी शब्दों की स्पष्ट रूप से कहीं भी व्याख्या नहीं की है। श्रमजीवी वर्ग की केवल एक परिभाषा उपलब्ध है जो एंजिल्स की दी हुई है। इसके अनुसार, “श्रमजीवी वर्ग समाज का वह वर्ग है जो अपने जीविकोपार्जन के लिए पूर्ण रूप से अपने श्रम के विक्रय पर निर्भर होता है, न कि पूंजी के द्वारा प्राप्त लाभ पर उसका सुख-दुःख, जीवन-मरण और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उसके श्रम की माँग पर निर्भर होता है।" जहाँ तक 'बुर्जुआ' का प्रश्न है, सम्भवतया लेनिन ने भी कहा था कि बुर्जुआ उस सम्पत्ति का स्वामी है जिसका उपयोग वह श्रमजीवी के श्रम से अवैध लाभ प्राप्त करने के लिए करता है, जो हाथों में शोषण का एक महान् अस्त्र सौप देती है, जिसे अमिक कभी पसन्द नहीं करते।
राज्यहीन व वर्गविहीन समाज की स्थापना का आदर्श
साम्यवादी राज्य (Communist State) का अस्तित्व वर्ग संघर्ष के कारण मानते हैं और उनके अनुसार राज्य एक स्थायी संस्था नहीं है। अतः उसका विचार है कि सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतावाद के बाद जब विरोधी वर्गों का अन्त हो जाएगा, तो राज्य की सत्ता का भी अन्त हो जाएगा और राज्यहीन व वर्गविहीन समाज की स्थापना के बाद से ही वास्तविक साम्यवादी समाज का प्रारम्भ होगा।
मार्क्स के अनुसार राज्यहीन (Stateless) और वर्गविहीन (Classless) आदर्श समाज में धर्म, जाति, रंग तथा धन के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और प्रत्येक को अधिकतम न्याय प्राप्त हो सकेगा। ऐसे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को कुछ निश्चित समय के लिए आवश्यक रूप में परिश्रम करना पड़ेगा और उत्पादन सामाजिक आवश्यकताओं के अधीन होगा।
प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं और योग्यता के अनुरूप वस्तुएँ व पारिश्रमिक प्राप्त होगा और जो व्यक्ति काम करने के योग्य नहीं होंगे, उनके लिए सामाजिक सहायता और सामाजिक बीमे की व्यवस्था होगी।
अन्तरिम काल में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकतन्त्र
मार्क्स राज्य अनावश्यक कहकर उसके विलीनीकरण में तो विश्वास व्यक्त करता है, लेकिन इसके साथ वह यह मानता है कि साम्यवादी क्रान्ति के प्रथम चरण में ही राज्य का अन्तर सम्भव या वांछनीय नहीं होता है।
पूँजीवाद के अन्त के बाद भी राज्य कुछ समय तक अस्तित्व में रहेगा और इस काल में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद स्थापित होगा। इस काल में राज्य की शक्ति का प्रयोग सर्वहारा वर्ग के द्वारा पूँजीपतियों के प्रतिरोध को कुचलने तथा पूँजीवाद के अवशेषों को समाप्त करने के लिए किया जाएगा।
मार्क्स ने साम्यवादी घोषणा-पत्र में कहा है कि अन्तरिम काल में सर्वहारा वर्ग की अधिनायकवादी सरकार द्वारा वैयक्तिक सम्पत्ति के उन्मूलन, पैतृक अधिकारों की समाप्ति, यातायात तथा संवादवाहन के साधनों का राष्ट्रीयकरण, बच्चे की अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा, उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण तथा पूँजीपतियों की जमा पूँजी को समाप्त करने के कठोर कदम उठाए जाने चाहिए। मार्क्स इस सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को ही वास्तविक लोकतन्त्र मानता है।


