Scholarly articles for Research Aptitude
1. शोध: अर्थ, प्रकार, और विशेषताएं, प्रत्यक्षवाद एवं उत्तर प्रत्यक्षवाद शोध के उपागम2. शोध पद्धतियां: प्रयोगात्मक, विवरणात्मक, ऐतिहासिक, गुणात्मक एवं मात्रात्मक3. शोध के चरण4. शोध प्रबन्ध एवं आलेख लेखन: फार्मेट और संदर्भ की शैली5. शोध में आईसीटी का अनुप्रयोग
परिचय (Introduction)
भारत का अतीत जान से परिपूर्ण था और भारतीय संचार का नेतृत्व करते
मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए सदैव प्रयासरत है, लेकिन सार्थक जीवन क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जाए? इन सब बातों के अवयोधन को ज्ञान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सरल भाषा में ज्ञान के विस्तार को हम अनुसंधान या शोध कहते हैं। यह जीवन के किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो सकता है। अनुसंधान के बिना जान के किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं हो सकती।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए सदैव परम्परागत तरीकों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। अनुसंधान हमें वास्तविकता के समीप लाने का निरंतर प्रयास करता है।
अगर हम स्थूल स्तर (macro-level) पर देखें- हम किसी महामारी का उपचार ढूंढना चाहते हैं, प्रदूषण कम करना चाहते हैं, मंगल ग्रह पर बस्ती बसाना चाहते हैं, शिक्षण प्रणाली में सुधार करना चाहते हैं, बाजार में कोई नया उत्पाद लेकर आना चाहते हैं, इन सब में सफल होने के लिए स्थूल स्तर पर अनुसंधान आवश्यक है।
अगर सूक्ष्म स्तर (micro-level) पर देखें कुछ छात्र स्मार्ट फोन खरीदना चाहते हैं और वह उसके लिए विभिन्न ब्राण्डों के तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, वह भी एक अनुसंधान ही है, चाहे उसके लिए हम अभिन हो कर (consciously) किसी अनुसंधान विधि का प्रयोग नहीं कर रहे होते हैं।
अनुसंधान समस्या निवारक होते हैं। मूलतः जब भी हमें किसी समस्या का सामना करना पड़ता है या कुछ जिज्ञासा उत्पन्न हो, हम अनुसंधान करने के लिए प्रेरित होते हैं। फलतः हम अनुसंधान के कार्य में आगे बढ़ते हैं। किसी विशेष ज्ञान क्षेत्र में शोध समस्या का समाधान या जिज्ञासा की पूर्ति में किया गया कार्य उस विशेष ज्ञान क्षेत्र का विस्तार है।
हम सामान्य जीवन में ज्ञान प्राप्ति के लिए पांच ज्ञान इंद्रियों (आँख, नाक, कान, जिवा और त्वचा, यानि व्यक्तिगत अनुभव (personal experiences) पर आश्रित होते हैं, परन्तु इनकी अपनी एक सीमा है। इसमें व्यक्तिनिष्ठता (subjectivity) की सम्भावना अधिक रहती है। यह अनुभूति (perception) से भी संबंधित है, हम एक ही घटना को अलग अलग रूप से देखते हैं।
वास्तविक तथ्यों, सिद्धांतों और अवधारणाओं से परिचित होना भी समान्यतः ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। ज्ञान प्राप्त करना एक सतत् प्रयास है। अनुसंधान किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान के लिए महत्त्वपूर्ण है।
अनुसंधान की परिभाषा (DERNITION OF RESEARCH)
अनुसंधान द्वारा हम नये तथ्यों को ढूंढ निकालते हैं। अनुसंधान शोध, गवेषणा, ओज, अन्वेषण, मीमांसा, अनुशीलन, परिशीलन, आलोचना, रिसर्च, आदि नामों का भी प्रयोग किया।
अनुसंधान (research) दो शब्दों से मिलकर बना है: re and search अर्थात् पुनः खोज या कुछ नया जानने संबंधी खोज। ये एक प्रकार से सही तथ्य प्राप्त करने के लिए अन्वेषण है। अनुसंधान विशेष कौशलों का एक संग्रह है यह सोच का एक ढंग है और यह किसी विषय वस्तु के विभिन्न पहलुओं की गंभीर रूप से जांच करता है।
एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी (Advanced Learner's Dictionary) के अनुसार, 'अनुसंधान विशेष रूप से नए तथ्यों की खोज के लिए की जाने जे. डब्ल्यू. क्रॉस्बेल (J. W. Creswell) के अनुसार, 'अनुसंधान किसी विषय के बारे में जानकारी को एकत्रित करने एवं उसका विश्लेषण
वाली एक सावधानीपूर्ण जांच है।' करने की प्रक्रिया है।'
यहां बहुत सारी परिभाषाएँ दी जा सकती हैं, विभिन्न परिभाषाओं से एक सामान्य सहमति प्राप्त होती है कि अनुसंधान जांच की एक व्यवस्थित और विधिपूर्वक प्रक्रिया या 'विधिवत अंवेषण' (systematic investigation) है। अनुसंधान वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होता है, इसलिए इस पर आधारित ज्ञान भी वस्तुपरक या वस्तुनिष्ठ (objective) होता है। वैज्ञानिक पद्धति के अंतर्गत तथ्यों की व्याख्या करना, उनका वर्गीकरण एवं व्यवस्थित अवलोकन को समावेशित किया जाता है। अनुसंधान मूल रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific approach) पर आधारित है, फिर चाहे विषय मौलिक विज्ञान (basic sciences) जैसे कि भौतिकी, रसायन हो या फिर समाजिक विज्ञान (social sciences) जैसे कि इतिहास, दर्शन शास्त्र, इत्यादि हो ।
अनुसंधान निश्चित सोपानों से युक्त एक ऐसी अच्छी तरह सोची समझी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समस्या विशेष के समाधान हेतु कुछ नवीन ज्ञान की प्राप्ति अथवा पुराने ज्ञान के आवश्यक संशोधन का मार्ग तय किया जाता है। मान लीजिए कि आप एक शिक्षक हैं, शिक्षक होने के नाते आप के सामने अनुसंधान के योग्य क्या विषय या प्रश्न हो सकते हैं?
1. ग्रामीण छात्रों की कौन-सी विशिष्ट परिस्थितियाँ एवं समस्याएँ होती हैं?
2. इन विशिष्ट परिस्थितियों के कौन-से संभावित कारण हैं? 3. किसी शिक्षण संस्थान की शिक्षा-पद्धति से विद्यार्थियों के माता-पिता कितने संतुष्ट हैं।
4.शिक्षण पद्धति में परिवर्तन से छात्रों की बोध शक्ति पर क्या संभावित प्रभाव होगा?
अनुसंधान के लिए अंतहीन प्रश्न एवं विषय हो सकते हैं।
विषय विशेष
दर्शनशास्त्र में ज्ञान एवं अनुसंधान से संबंधित कुछ रोचक बातें
नेट की परीक्षा में कई बार इस प्रकार के प्रश्न पूछे गए हैं। इससे अनुसंधान के बारे में भी कई तथ्य स्पष्ट होते हैं।
यदि हम बीसवीं शताब्दी के दूसरे भाग, विशेषकर अंतिम दो दशकों को 'सूचना का विस्फोट' मानते हैं, तो इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ को 'ज्ञान का विस्फोट' कह सकते हैं। ज्ञान का अर्थ है---सूचना, चिंतन एवं तर्क। हमारी सभ्यता में ज्ञान की बहुत उच्च स्थान दिया गया है। 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।'
ज्ञान का उद्देश्य अज्ञान को समाप्त करना है, ज्ञान बल है, ये संशय का नाशकारी है, यह मंथन पर आधारित है और विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। ज्ञान की उत्कट अभिलाषा अनेक अविष्कारों को जन्म देती है।हमारा साहित्य, महापुरुषों का जीवन, अध्यापक, अनुभव, आत्म चिंतन, विज्ञान, कंप्यूटर, स्वाध्याय, आदि ज्ञान के विभिन्न स्रोत हैं। हम पिछले अध्याय में दर्शनवाद (दर्श का अर्थ है देखना) के विभिन्न रूपों- आदर्शवाद, प्रकृतिवाद तथा प्रयोगवाद, आदि की चर्चा कर चुके
हैं। दार्शनिक चक्र के विभिन्न अवयव हैं विस्मय की भावना, सन्देह (doubting), मीमांसा (criticism), चिंतन (reflection), तटस्थता (detachment) हैं।
आइए, अब कुछ और बातों को जान लें:
तत्व मीमांसा (Metaphysics): यह सत्य के स्वरूप की खोज है। यह अस्तित्व, समय, स्थान, आदि का बोध है।
ज्ञान मीमांसा (Epistemolgy): इसे रोचक शब्दों में ज्ञान का ज्ञान कहते हैं- ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाए? यह ज्ञान के स्रोत, प्रकृति, विषय क्षेत्र तथा ज्ञान प्राप्ति की विधियों के बारे में है। एपिस्टेमोलोजि शब्द का उपयोग सर्वप्रथम फ्रेडरिक फेरियर (Frederick Ferrier) ने किया था।
ज्ञान प्राप्ति के मार्ग
ज्ञान प्राप्ति के मुख्य दो मार्ग हैं- तर्कवाद और अनुभववाद ।
1. तर्कवाद (Rationalism): इसमें यह माना गया है कि मस्तिष्क का इन्द्रियों पर नियंत्रण होता है। इसमें तर्क अनुभव से पहले आता है। यह निगमन (deduction) से संबंधित है, जिसकी चर्चा अनुसंधान के प्रकारों के अन्तर्गत की गई है।
2. अनुभववाद (Empiricism): इसमें इन्द्रियों को मस्तिष्क से ऊपर माना गया है, इससे इन्द्रियों द्वारा संसार से प्राप्त कच्चे आंकड़े मस्तिष्क तक जाते हैं। इसके बिना कोई ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता। ये आगमन से संबन्धित है।
अनुसंधान रूप-निदर्शन (Research paradigm) दो प्रकार के होते हैं: प्राकृतिक विज्ञान (natural sciences) जैसे कि भौतिकी, रसायन, आदि एवं सामाजिक विज्ञान (social sciences) जैसे इतिहास, समाज शास्त्र, आदि की अनुसंधान प्रक्रियाओं में अन्तर होता है।
1. प्रत्यक्षवादी रूप-निदर्शन (Positivist Para-digm): इसके अनुसार सामाजिक विज्ञान में शोध वैसे ही होना चाहिए जैसे कि प्राकृतिक विज्ञान में होता है। इसके अनुसार शोध यथा संभव संरचित होना चाहिए, दूसरे शब्दों में, अनुसंधान मात्रात्मक होना चाहिए। इसका वर्णन अनुसंधान के प्रकारों के अंतर्गत किया गया है। नियतिवाद (determinism) का अर्थ है कि घटनाएं अन्य परिस्थितियों की वजह से घटित होती हैं। इसलिए, भविष्यवाणी और नियंत्रण के उद्देश्य से कारक-कारणीय संबंध को समझना आवश्यक है।
2. व्याख्यात्मक रूप-निदर्शन (Interpretive Paradigm):
इसको अधिकतर गुणात्मक अनुसंधान से संबन्धित माना जाता है। इसके अनुसार शोध प्रारूप लचीला होना चाहिए। गुणात्मक अनुसंधान की विस्तृत चर्चा अनुसंधान प्रकारों के अंतर्गत की गई है। नेट परीक्षा में वेस्टहेन (Verstehen) रूप-निदर्शन पर प्रश्न पूछा गया जो कि व्याख्यात्मक रूप-निदर्शन जैसा है।
समाज शास्त्र और मानव-शास्त्र से संबंधित है। इसको मैक्स वेबर (Max Weber) ने नामित किया। प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) में शोध के लिए। एकलारें (Erklaren) शब्द का प्रयोग किया जाता।


