एन्थॉनी गिडेन्स (Anthony Giddens)
गिडेन्स के संरचनाकरण का सिद्धान्त,परिभाषा और उन की प्रमुख कृतियाँ
ब्रिटिश समाजशास्त्री एन्थॉनी गिडेन्स ने समाजशास्त्री सिद्धान्त के क्षेत्र में काफी लेखन कार्य किया है। ये उत्तर आधुनिकतावाद के विचारक माने जाते हैं। उनकी प्रमुख रुचि शास्त्रीय सिद्धान्त, पूँजीवाद, सामाजिक वर्ग तथा सामाजिक परिवर्तन में रही है। इन्होंने आधुनिकता की उन्नत अवस्था का वर्णन करने के लिए जगरनॉट शब्द का भी प्रयोग किया। उनका सबसे प्रमुख कार्य संरचनाकरण का सिद्धान्त रहा है जिससे संरचना का मतलब उन नियमों (Rules) और साधनों (Resources) से होता है, जिसका प्रयोग कर्ता या व्यक्ति पारस्परिक क्रियाओं के सन्दर्भ में करते हैं। उल्लेखनीय है कि ये नियम और साधन विभिन्न स्थानों और समय पर उपयोग में लिए जाते हैं अर्थात् नियमों और साधनों को स्थान और समय के साथ जोड़ते हैं।
एन्थॉनी गिडेन्स का संरचनाकरण का सिद्धान्त
गिडेन्स का प्रमुख कार्य संरचनाकरण का सिद्धान्त है। गिडेन्स ने विवेचनात्मक समाजशास्त्र के अन्तर्गत कई नवीन प्रवृत्तियों को प्रतिपादित किया। गिडेन्स के विचारों में समीक्षा का पुट है तथा विश्लेषण अभिव्यक्ति को तर्कपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करने की विलक्षण प्रतिभा है। संरचनाकरण सिद्धान्त की पृष्ठभूमि निर्माण में उन्होंने ब्रिटिश तथा अमेरिकी दार्शनिक के कर्म सिद्धान्त में व्याप्त असंगति की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
गिडेन्स का विचार है कि सामाजिक क्रियाएँ समय एवं स्थान में घटती हैं, इसलिए गिडेन्स ने अपने संरचनाकरण सिद्धान्त को अप्रकार्यवादी घोषणा-पत्र कहा है। इनका मत है कि मानव इच्छाओं से मानव इतिहास का पलायन तथा उस पलायन के परिणामों की मानव क्रिया पर कारणात्मक प्रभावों के रूप में वापसी सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषता है, किन्तु प्रकार्यवाद उस वापसी की समीक्षा पुनरुत्पादित सामाजिक तत्त्वों के अस्तित्व के लिए समाज के तर्क के रूप में करता है। गिडेन्स के संरचनाकरण सिद्धान्त की मान्यता है कि सामाजिक व्यवस्थाओं का उद्देश्य कारण या आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि केवल व्यक्ति संरचनाकरण करता है। संरचनावादी विचारों में गिडेन्स ने काल, इतिहास तथा समकालीन ऐतिहासिक विकासशील विभाजनों पर प्रकार्यवादी चिन्तन की तुलना पर अधिक बल दिया है।
सिद्धान्त का संरचनात्मक परिप्रेक्ष्य
गिडेन्स का मत है कि प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता समाज के, जिसका वह सदस्य है, पुनरुत्पादन की दशाओं के बारे में बहुत अधिक जानकारी रखता है। उनका मत है कि सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिस सामाजिक व्यवस्था का वे निर्माण करते हैं या पुनरुत्पादन करते हैं, उसका ज्ञान होता है। यह संरचना की द्वैत अवधारणा की एक आवश्यक विशेषता है। इस सन्दर्भ में वह व्यावहारिक चेतना जिस पर कर्ता सामाजिक क्रिया की रचना में विवेचनात्मक चेतना से अन्तर व्यक्त करता है। कर्ताओं में पाए जाने वाले विमर्शात्मक या तर्कमूलक अन्तः प्रवेश को प्रकृति एवं विषय क्षेत्र में गिडेन्स ने काफी महत्त्वपूर्ण माना है। और इसे सामूहिकता में नियन्त्रण का द्वन्द्व कहा है।
गिडेन्स के संरचनात्मक सिद्धान्त की मान्यताएँ
- संरचनावादी सिद्धान्त, भाषा और समाज दोनों की संरचना में पार्थक्य द्वारा अन्तराल का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
- संरचनाकरण कालिक आयाम को अपने विश्लेषण के केन्द्र में रखने का प्रयत्न करता है।
- संरचनावाद प्रकार्यवाद की तुलना में सामाजिक सम्पूर्णता के अधिक उपयुक्त एवं सन्तोषप्रद अवबोधन का निरूपण करता है। गिडेन्स का मत है कि इस बिन्दु को समझने के लिए संरचना एवं व्यवस्था में अन्तर दिया जाना आवश्यक होगा, क्योंकि इसका संरचनावादी एवं प्रकार्यवादी चिन्तन में अभाव है।
- संरचनावाद सामाजिक पुनरुत्पादन के सिद्धान्त पर बल देता है।
- संरचनावाद वस्तु तथा विषय के द्वैत का करने का प्रयत्न करता है।
- गिडेन्स का मत है कि स्व-विमर्श को निम्न दो दृष्टियों से संरचित किया जाना चाहिए- समाज के सदस्यों के सन्दर्भ में, आचरणों का अध्ययन किया जाना चाहिए एवं मानव प्रयास के रूप में स्वयं समाज विज्ञान के सन्दर्भ में।
- संरचनावादी सिद्धान्त ने सांस्कृतिक वस्तुओं के उत्पादन के विश्लेषण में स्थायी योगदान दिया है।
निष्कर्ष
एन्थॉनी गिडेन्स की प्रमुख कृतियाँ
- केपिटलिज्म एण्ड मॉडर्न सोशल थ्योरी, 1971
- पोलिटिक्स एण्ड सोशियोलॉजी इन द थॉट्स ऑफ मैक्स वेबर, 1972
- द क्लास स्ट्रक्चर ऑफ द एडवान्स्ड सोसायटीज़, 1973
- पोसिटिविज्म एण्ड सोशियोलॉजी, 1974
- स्टडीज़ इन सोशल एण्ड पोलिटिकल थ्योरी, 1977
- बे एण्ड लेफ्ट एण्ड राइट : द फ्यूचर ऑफ रेडिकल पोलिटिक्स, 1994
- इमाइल दुर्खीम, 1978
- सेण्ट्रल प्रोब्लम्स इन सोशल थ्योरी
- सोशियोलॉजी : ए ब्रीफ बट क्रीटिकल इन्ट्रोडक्शन, 1982
- द कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ सोसायटी, 1984
- द नेशन, स्टेट एण्ड वॉयलेन्स, 1985
- द कॉन्सीक्वेन्सिस ऑफ मॉडर्निटी, 1990
- मॉडर्निटी एण्ड सेल्फ इडेन्टिटी, 1991
- द ट्रान्सफॉरमेशन ऑफ इन्टीमेसी, 1992
- इन डिफेन्स ऑफ सोशियोलॉजी, 1996


