इकाई । समाजशास्त्रीय सिद्धान्त
इमाइल दुर्खीम की रचनाएँ
• द डिविजन ऑफ लेबर इन सोसायटी, 1893• रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मैथड 1895• सुसाइड, 1897• द एलिमेण्टरी फॉर्म्स ऑफ रिलीजियस लाइफ, 1912• एजुकेशन एण्ड सोसायटी, 1922• सोशियोलॉजी एण्ड फिलॉसफी, 1924• एजुकेशन मोरल, 1925• सोशियोलिज्म, 1928
शास्त्रीय समाजशास्त्रीय परम्पराएँ | Classical Sociological Traditions
11700 ई. के बाद अर्थात् 18वीं और 19वीं शताब्दी में समाजशास्त्र में कई सामाजिक विचारक उभर कर आए, जिनके विचार धार्मिक मान्यताओं से हटकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थे। इन समाजशास्त्रीय विचारकों में इमाइल दुर्खीम, मैक्स वेबर तथा कार्ल मार्क्स महत्त्वपूर्ण हैं, जिन्होंने शास्त्रीय समाजशास्त्र परम्परा को अध्ययनोन्मुखी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
समाजशास्त्रीय परंपराएं और आधुनिकता दोनों ही विचार मूल्यों तथा संस्थाओं का सम्मिलित रूप है। ये विचार, मूल्य और सम्याएं परम्परा और आधुनिकता में भिन्न-भिन्न होते हैं। पर समाज को एक समूह है जी सामाजिक संगठन के सभी स्तरों में व्याप्त होती है। परम्परा सामाजिके तीन तत्त्व मूल्यों की व्यवस्था सामाजिक संरचना और उसके परिणामस्वरूप व्यक्तित्व को सरचना होते है। सत्र में परम्परा का सामाजिक सांस्कृतिक अथवा कार्यात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता है। परम्परा का अर्थ अपेक्षाकृत आधुनिक काल में विकसित हुआ है। किसी भी समाज में विकास निरन्तर होता रहता है, लेकिन फिर भी कुछ ऐसे तत्त्व, और सामाजिक संरचना के कुछ अगस्यायों रूप में बने रहते है, जिसे परम्परा कहा जाता है। समाजशास्त्रीय परम्परा के प्रमुख विद्वान इमाइल दुखी, मैक्स देकार्ल मार्क्स आदि है। इसका विस्तृ विवरण निम्न प्रकार है.
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इमाइल दुर्खीम |Emile Durkheim
कोलविषय के रूप में पहचान दिलाने वाले शास्त्री माइल दुख का जन्म 15 अप्रैल 1858 को फ्रांस के एक छोटे से कस्बे एपीनल में हुआ था यहूदी परिवार में जन्मे दुखीम बचपन से ही प्रतिभा सम्पन्न थे। एपिनल कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात् इन्होंने पेरिस की विख्यात कोल अकादमी में शिक्षा ग्रहण को 1885 ई. में ये शिक्षा प्राण करके जर्मनी गए और अर्थशास्त्र लोक औरतका वस्तृत अध्ययन किया। इस दौरान ये बोर्डिग्स विश्वविद्यालय प्रोफेसर नाम से प्रभावित हुए। 1896 ई. में ये बोर्डियास विश्वविद्यालय में समान विज्ञान के प्रोफेसर बने।
वर्ष 1902 में इन्होंने पेरिस विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में योगदान दिया। साथ ही 1835 ई. में शुरू किए गए ऑगस्ट कॉम्टे के कार्यों को महाते हुए वर्ष 1913 में समाजशास्त्र के पहले प्रोफेसर बनकर समाजशास्त्र को एक विषय के रूप में प्रतिस्थापित किया। इस दौरान इन्होंने विभिन्न सिद्धान्तों व विचारों को जन्म दिया। 15 नवम्बर, 1917 को 59 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हो गई। यद्यपि इनके विचार आधुनिक व वर्तमान समय में भी प्रेरणादायक है।
फ्रांसीसी समाजशास्त्री इमाइल दुखीम ने सामाजिक तथ्य (Social Fact), आत्महत्या (Suteide), धर्म (Religion) व श्रम विभाजन (Division of (Labour) आदि के विषय में उल्लेखनीय योगदान दिया है। दुखीम समाजशास्त्र के प्रत्यक्षवादी, विकासवादी तथा प्रकार्यवादी (धर्म) समाजशास्त्री थे। उन्होंने समाजशास्त्र को ठोस वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति एवं व्यवस्थित विषय-वस्तु प्रदान की है और समाजशास्त्र को समाज का अध्ययन करने वाला विज्ञान कहा है। दुखॉम ने सामाजिक अन्त: क्रिया का गहन अध्ययन किया और इसी आधार पर महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रीय विचार प्रस्तुत किए।
© दुर्खीम के विचार
• दुखम ने समाज में घटित होने वाली सभी घटनाओं का कारण समाज को बताया है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अपेक्षा समाज को प्रधानता देनी होगी, क्योंकि व्यक्ति समाज की देन है।
• समाज प्रकार्यात्मक एकीतन्त्र है अर्थात् इसे आपस में सम्बन्धित अवययों के एक तन्त्र के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि इसके किसी भी अवयव को पृथक् करके नहीं समझा जा सकता है। दुर्खीम की प्रसिद्ध रचना व द डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी तथा द रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मेथड में प्रकार्यवाद की विवेचना की गई है।
• समाज एक नैतिक वास्तविकता है जो सामूहिक मनोभावों, विचारों व भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
दुर्खीम का समाजशास्त्रीय सिद्धान्त |Sociological Principles of Durkheim
दुर्खीम द्वारा प्रतिपादित समाजशास्त्रीय सिद्धान्त की अवधारणा उनकी पुस्तक "रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मेथड में विस्तार से दी गई है। दुर्खीम के सामाजिक तथ्य का विचार हरबर्ट स्पेन्सर द्वारा दिए गए व्यक्तिवादी विचारों से बिल्कुल भिन्न है। उनका मत था कि जितनी भी सामाजिक क्रियाएँ हैं, उनका विश्लेषण सामाजिक सन्दर्भ के अधीन ही किया जाना चाहिए अर्थात् सामाजिक क्रियाओं को समझने का आधार समाज है। इसलिए व्यक्ति या मनोविज्ञान को आधार मानकर जो समाजशास्त्रीय अध्ययन किए जाते हैं, वह हमेशा अवैज्ञानिक माने जाते हैं।
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दुखीम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों का अध्ययन बताया है। दुर्खीम का मानना था कि जिस प्रकार सभी विशेषज्ञ अपने-अपने अध्ययन के विषय का चयन करते हैं, ठीक उसी प्रकार समाजशास्त्रियों ने भी सामाजिक तथ्य का चयन कर उनका विश्लेषण विस्तार से किया है, क्योंकि सामाजिक तथ्य ही समाजशास्त्रीय अध्ययन का प्रमुख अध्ययन क्षेत्र है। दुखोंम ने "सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं की तरह समझाने पर बल दिया है। सामाजिक तथ्य को उन्होंने एक वस्तु एक चीज या एक भौतिक पदार्थ के रूप में देखा है। जिस प्रकार एक भौतिक पदार्थ का अध्ययन भौतिकी में किया जाता है, ठीक उसी प्रकार समाजशास्त्री 'सामाजिक तथ्य' का अध्ययन करते हैं। दुखींम ने सामाजिक तथ्य के स्वरूप के वर्णन में आत्महत्या के विवेचन का वर्णन विस्तार से किया है। आत्महत्या व्यक्ति के व्यक्तिगत रूप से जुड़ी होती है, परन्तु जब यह व्यक्तिगत सोच, सामाजिक सोच का रूप ले लेती है, तब इसका एक सामूहिक स्वरूप भी बन जाता है जिसके कारण समाज भी प्रभावित होता है। इसलिए उन्होंने आत्महत्या का एक सामाजिक तथ्य के रूप में समाजशास्त्रीय अध्ययन किए जाने पर बल दिया। दुखीम के द्वारा सामाजिक तथ्यों का विश्लेषण निम्नलिखित विशेषताओं के साथ उल्लेखित है।
बाह्यपन
दुखीम ने सामाजिक तथ्य की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए यह बताया है कि सामाजिक तथ्य मनुष्य के बाहर रहता है तथा मनुष्य के बाहर रहते हुए भी उसके विचारों को प्रभावित करता है। इसलिए इसे समझना आसान हो जाता है।
आन्तरिकता
दुर्खीम के अनुसार, सामाजिक तथ्य मनुष्य के बाहर भले ही रहता है, परन्तु यह व्यक्ति को आन्तरिक रूप से प्रभावित करता है। इसके प्रभाव तथा महत्त्व को सभी व्यक्ति अपने अन्दर अनुभव कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, समाज का जो अनुमोदन व्यक्ति को प्राप्त होता है, उसका प्रभाव मनुष्य के ऊपर उसके व्यवहार को नियन्त्रित करने में पड़ता है। जिसके कारण व्यक्ति अपने व्यवहार को नियन्त्रित करता है।
सार्वभौमिकता
दुखींम के अनुसार, सामाजिक तथ्यों का स्वरूप सार्वभौमिक (Universality) होता है अर्थात् यह सभी व्यक्ति की चेतन अवस्था को समान रूप से प्रभावित करता है। उदाहरणस्वरूप यह कहा जा सकता है कि जब हम किसी धर्म की बात करते हैं, तब यह स्वीकार करते हैं कि धार्मिक विश्वास तथा उसके अनुरूप उपासना करना सभी व्यक्तियों के सामूहिक जीवन का अंग होता है। अर्थात् तथ्यों के दो स्वरूप होते हैं-एक स्वरूप वह है जो व्यक्ति तक ही सीमित है और दूसरा स्वरूप उसका सामाजिक स्वरूप जो उसके कार्य करने की पद्धति, सोचने की पद्धति को व्यक्तिगत रूप से भी प्रभावित करता है। इसके साथ ही तथ्य का एक अन्य सामाजिक स्वरूप होता है, जिसके कारण व्यक्ति के अतिरिक्त पूरा समाज उससे प्रभावित रहता है।
वस्तुनिष्ठता
सामाजिक तथ्यों की वस्तुनिष्ठता से आशय सामाजिक तथ्यों का अध्ययन बिना पूर्वाग्रहों को जाने हुए करना। इसके माध्यम से दुखींम ने सामाजिक पूर्व निर्धारित सोच की आलोचना करते हुए नई सोच के साथ समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने का प्रयास किया।
उदाहरणस्वरूप दुर्खीम ने आत्महत्या की प्रवृत्ति का विश्लेषण किया और पाया कि अविवाहित व्यक्ति में विवाहित व्यक्ति की अपेक्षा आत्महत्या की प्रवृति अधिक प्रवृति पाई जाती है। वहीं धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति में भी इसकी प्रवृति कम पाई जाती है। इस प्रकार दुखींम ने सामाजिक तथ्यों को वस्तुनिष्ठता के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया।
दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धान्त
दुर्खीम ने आत्महत्या को एक व्यक्तिगत घटना माना है जिसके कारण आवश्यक रूप से सामाजिक होते हैं। सामाजिक शक्तियाँ जिनका उद्गम व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होता है, आत्महत्या का निर्धारण करती हैं। ये शक्तियाँ समाज में विभिन्न सामाजिक समूहों में तथा धर्मों में होती हैं। दुखम के अनुसार, आत्महत्या के सिद्धान्त मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, आनुवंशिक विज्ञान तथा भौगोलिक कारकों पर आधारित होते हैं। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने आनुभविक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं। उनका मानना है कि आत्महत्या आनुवंशिकता, तनावों आदि कारणों से नहीं होती हैं, परन्तु यह सामाजिक संरचना के कारण होती है, जो सम्भावित आत्महत्या को बढ़ावा देती है।
दुखम के आत्महत्या के सम्बन्ध में विचार निम्नलिखित हैं
• समाज की धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक एकात्मकता जितनी अधिक होगी, आत्महत्या की संख्या उतनी ही कम होगी।
• आत्महत्या सामाजिक क्षीण व्यवस्था का परिणाम होती है। आत्महत्या की दर आयु, लिंग, धर्म, निवास स्थान, वैवाहिक स्थिति, पारिवारिक संरचना आदि के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है।
• आत्महत्या का सम्बन्ध किसी व्यक्ति से ही नहीं, बल्कि पूरे समाज से होता है।
दुर्खीम का प्रकार्यवाद। Functionism of Durkheim
समाजशास्त्र में प्रकार्यवाद (Functionism) का प्रारम्भ स्पेन्सर से माना जाता है, किन्तु इसे वैज्ञानिक रूप से प्रतिष्ठित करने का श्रेय दुखम को है। उन्होंने अपनी रचना 'द डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी' तथा 'द रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मैथड' में प्रकार्यवाद की विवेचना की। इन्होंने समाजशास्त्र में विश्लेषण की विधि को प्रकार्यवाद का नाम दिया है। दुर्खीम के अनुसार, प्रकार्य का अर्थ "किसी भी इकाई द्वारा उससे सम्बन्धित व्यवस्था को बनाए रखने में दिया जाने वाला योगदान है।"
दुर्खीम के कथनानुसार, प्रकार्यात्मक पद्धति का उद्देश्य किसी भी समूह, समाज, संगठन और संस्कृति की इकाइयों को ज्ञात कर उनके प्रकार्यों को बताना है। दुर्खीम का मत है कि प्रकार्य शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है
1. इसका प्रयोग जीवन देने वाली गतिविधियों की व्यवस्था के रूप में किया जाता है, जिसके परिणामों से कोई तात्पर्य नहीं रहता।
2. दूसरा प्रयोग सम्पूर्ण व्यवस्था में उसकी आवश्यकता के रूप में किया जाता है।
दुर्खीम ने समाज को एक जीवधारी की भाँति माना है। जिस प्रकार शरीर को जीवित रखने के लिए कुछ आवश्यकताओं, जैसे-हवा-पानी की पूर्ति आवश्यक है, वैसे ही समाज को जीवित रखने के लिए कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है। समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति जिन गतिविधियों के द्वारा होती है, उन्हें ही वह उनका प्रकार्य कहता है। परिवार, धर्म, नातेदारी, राजनीतिक संगठन तथा आर्थिक संगठन समाज व्यवस्था को चलाने में अपना जो योगदान देते हैं, वही उनका प्रकार्य है। दुखींम ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रकार्यों की अवधारणा विकसित की।
प्रकार्यवाद के लिए स्पेन्सर का प्रभाव
दुर्खीम का प्रकार्यवाद स्पेन्सर के प्रकार्यवाद से प्रभावित था। वे सामाजिक व्यवस्था में समाज की इकाई या अंग द्वारा सम्पूर्ण समाज व्यवस्था को चलाने में उसके द्वारा किए जाने वाले योगदान को ही उसका प्रकार्य मानते है। स्पेन्सर के अनुसार, "प्रकार्य किसी इकाई का वह अवलोकित परिणाम है, जो व्यवस्था के अनुकूलन या समायोजन में योगदान देता है।" प्रकार्यवाद के क्षेत्र में दुर्खीम द्वारा दिए गए योगदान को ही रेडक्लिफ ब्राउन, मैलिनोवस्की, मर्टन, पारसन्स एवं लेवी स्ट्रॉस ने आगे बढ़ाया।
दुर्खीम के प्रकार्य का धर्म, अपराध एवं श्रम विभाजन
दुखॉम ने प्रकार्य को स्पष्ट करने के लिए, गर्म, अपराध, और श्रम के प्रकार्यों के उदाहरण दिए है। वे कहते हैं कि प्रत्येक सामाजिक घटना का कोई-न-कोई प्रकार्य होता ही है अर्थात् सामाजिक व्यवस्था की स्थापना में उसका कुछ-न-कुछ योगदान अवश्य ही होता है।
धर्म के प्रकार्य
दुर्खीम ने धर्म के प्रकार्यों का उल्लेख किया। इसके लिए उसने ऑस्ट्रेलिया की अरुण्टा जनजाति का अध्ययन कर धर्म का प्रकार्य देता। दुख के अनुसार, धार्मिक धारणाएँ सामाजिक जीवन में मजबूत कारक प्रदान करती है। सामाजिक व्यवस्था की यह माँग है कि व्यक्ति अपने अन्दर समाजक अनुभव करे, समाज पर अपनी निर्भरता अनुभव करे और अपने न दायित्वों को समझे जो समाज की दृष्टि से मौलिक है। धर्म इस रूप में व्यक्ति में चेतना जाग्रत कर व्यक्ति के सम्मुख यह स्पष्ट कर देता है कि वह पूर्णतया समाज पर निर्भर है।
अपराध के प्रकार्य
दुखम ने अपने प्रकार्यवाद में अपराध प्रकार्य का भी उल्लेख किया है। इसे ये सामाजिक विकृति मानते हैं। उनका मानना है कि समाज में सामाजिक एकीकरण तथा समाज में विघटन की प्रवृत्ति के कारण मौजूद होते हैं। विघटन व अलगाव की प्रवृत्ति, सामाजिक विकृति, अपराध जैसे प्रकार्य को भी प्रोत्साहित करती है। इनका मानना है कि समाज में दो प्रकार के नियम पाए जाते हैं।
पहला नियम दमनकारी नियम होता है, जो प्रतिक्रिया को जन्म देता है, क्योंकि अपराध सामूहिक अन्त:करण के लिए अघात होता है। वहीं दूसरे प्रकार का नियम प्रतिबन्धात्मक होता है, जो किसी गलत कार्य होने पर व्यवस्था को बनाए रखता है। ये नियम सहकार्यात्मक होता है।
इस प्रकार दुर्खीम बताते हैं कि जो लोग कुछ सामाजिक नियमों से अप्रसन्न होते हैं वे समाज को बदलने की कोशिश करते हैं, जिससे अराजकता फैलती है।
श्रम विभाजन के प्रकार्य
दुर्खीम ने अपनी पुस्तक में श्रम विभाजन के प्रकार्यों का भी उल्लेख किया है। श्रम विभाजन समाज में दो प्रमुख कार्य करता है-एक तो यह कि व्यक्तियों एवं समूहों को अलग-अलग प्रकार से उनके कार्यों के आधार पर विभाजित कर देता है। इससे समाज को विशेषज्ञों की सेवाएँ उपलब्ध होती है। दूसरा श्रम विभाजन के कारण समाज के विभिन्न लोगों एवं समूहों में पारस्परिक निर्भरता बढ़ती है, वे परस्पर सम्बन्धित हो जाते हैं। पारस्परिक निर्भरता वाली एकता को दुखॉम सावयवी एकता कहता है।
प्राचीन समय में श्रम विभाजन अधिक क्रियाशील नहीं था, फिर भी समाज में एकता थी। इस प्रकार दुखींम द्वारा बताए गए प्रकार्यात्मक विश्लेषण के आधार पर हम सामाजिक व्यवस्था की प्रत्येक इकाई के प्रकार्यों की खोज कर सकते हैं। दुखींम का प्रकार्यवाद बाद में आने वाले समाजशास्त्रियों के प्रकार्यवाद से भिन्न है, किन्तु दुर्खीम का प्रकार्यवादी जगत में अपना एक पृथक् स्थान रखता है। उनका प्रकार्य के विश्लेषण का ढंग निराला है जो सामाजिक व्यवस्थाओं में इकाइयों के प्रकार्यों को ढूँढने में हमारा मार्ग प्रशस्त करता है तथा दुर्खीम को एक प्रकार्यवादी के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
दुर्खीम की समाजशास्त्रीय परम्पराएँ
दुखीम ने अपनी पुस्तक 'द डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी' में आधुनिक और पारम्परिक समाजों का अन्तर दिखाते हुए यह प्रतिपादित किया है कि आधुनिक समाज जहाँ श्रम के विशेषीकरण पर आधारित होता है, वहीं पारम्परिक समाज विश्वास पर चलता है। उनके अनुसार, समाज के रूपों का यह अन्तर नियमों की व्यवस्था के अन्तर को भी दर्शाता है।
इस प्रकार आधुनिक समाज स्व-नियमन से संचालित होता है, जबकि पारम्परिक समाज के नियम बाहरी विश्वासों और अनुमोदन पर आश्रित होते हैं। दुर्खीम के अनुसार, साझा विश्वास सर्वमान्य नैतिकता के प्राधिकार पर आश्रित होता है, इसलिए इस विश्वास पर आधारित व्यवस्था, शक्ति और दबाव के द्वारा ही बनी रह सकती है। जबकि स्व-नियमकारी या आधुनिक समाज स्वतन्त्रता, समानता तथा न्याय जैसे तत्त्वों के बिना सन्तुलित नहीं रह सकता है।
दुर्खीम मानते हैं कि समाज के पारम्परिक और आधुनिक रूपों में विभ्रम के कारण तथा आधुनिक समाजों पर पारम्परिक कानून या नियम थोपने की प्रवृत्ति ही कई सामाजिक समस्याओं के लिए जिम्मेदार रही है। आधुनिक समाजों की यह व्यवस्था दुर्खीम की कृति की विशिष्ट उपलब्धि मानी जाती है। दुर्खीम व्यक्ति के सामाजिक साहचर्य या जुड़ाव का विश्लेषण करते हुए यह विचार भी रखते हैं कि व्यक्ति को विशेष प्रकार के सामाजिक साहचर्य की आवश्यकता पड़ती है। दुर्खीम बताते हैं कि सामाजिक संस्थाओं के अन्दर स्वतः ही एक संसक्ति का तत्त्व होता है जो अपने सहभागियों से एक निश्चित व्यवहार की माँग करता है।
दुर्खीम इसीलिए इस बात पर बल देते हैं कि व्यक्ति के स्थान पर सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके अनुसार इन सामाजिक प्रक्रियाओं का ठोस रूप संस्थाओं और व्यवहार के रूप में अभिव्यक्त होता है, जिनका अनुवीक्षण के आधार पर भी अध्ययन किया जा सकता है।
NTA, UPSC SOSHLOGY OPTIONAL SOCIOLOGY,


