समापर्वन संस्कार
उपनयन संस्कार क्या है?
उपनयन संस्कार हिन्दू समाज में उपनयन बौद्धिक विकास से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण संस्कार है। इसका अभिप्राय वेदाध्ययन एवं स्वाध्याय के लिए आचार्य के पास जाने से था। यह केवल शूद्र को छोड़कर शेष तीनों वर्णों में किया जाता था। उपनयन की महत्ता इस बात से ही देखी जा सकती है कि व्यक्ति जन्म से तो शूद्र ही होता है लेकिन इस संस्कार के होने के बाद वह द्विज होता था-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते।
इस संस्कार के बाद ही बालक द्विज या दुबारा जन्म लिया हुआ कहा जाता था। इस संस्कार के सम्पादन की आयु के सम्बन्ध में विभिन्न धर्म ग्रन्थों में भिन्न-भिन्न विचार मिलते हैं अन्दोग्य उपनिषद में 8 या 16 वर्ष की आयु ब्राह्मण के लिए बतायी गयी है। गृहसूत्रों में इसे 7 या 8 कहा गया है। क्षत्रियों के उपनयन कि आयु 11 बतायी गयी है इसी प्रकार वैश्यों की 12 वर्ष बतायी गयी है पारस्कर गृहसूत्र में इन तीनों वर्णों के उपनयन संस्कार की अधिकतम आयु क्रमश: 16, 22 और 24 वर्ष निर्धारित की गयी है। धर्मशास्त्रों ने निश्चित उपदेश की प्राप्ति के लिए भी उपनयन की आयु निर्धारित की है। सूत्रकारों ने विभिन्न वर्णों के लिए अलग-अलग मंत्रों से विद्याधायन करने का निर्देश दिया। है आश्वलायन गृहसूत्र के अनुसार ब्राह्मण की गायत्री छन्द में, क्षत्रिय को त्रीष्टुप छन्द में और वैश्व को जगती छन्द में ना मंत्र से जप करने की व्यवस्था दी।
प्रारम्भ में उपनयन संस्कार का स्वरूप अत्यन्त सरल एवं सादगी पूर्ण था लेकिन समय के साथ-साथ इसमें भारी परिवर्तन आये। कालान्तर में इसमें अनेक कर्मकाण्डी एवं टोकाचारों ने अपना घर बना। लिया स्मृतियों के काल तक उपनयन संस्कार भारी भरकम कर्मकाण्डों, से बोझिल हो गया। इस संस्कार के बाद बालक ब्रह्मचारी के कौपिन वर्णानुसार क्रमश: अलग-अलग होता था। ब्रह्मचारी की दूसरी आवश्यकता मेखला थी यह भी वर्णों के अनुसार अलग-अलग थी। ब्रह्मचारी अपने पास दण्ड रखते थे जो क्रमश: पलास, उदुम्बर और बेल के होते थे। उन्हें यज्ञोपवीत पहनना होता था। यह भी वर्णों के
अनुसार अलग-अलग होता था इस संस्कार में विचाटन किया जाता था। इस संस्कार के बाद ही ब्रह्मचारी को वेद की शिक्षा दी जाती थी उपनयन संस्कार ही ब्रह्मचारी को वेदारम्भ संस्कार के योग्य बनती था विष्णु पुराण से ज्ञात है कि उपनयन संस्कार के बाद ही कृष्ण और बलराम, संदीपनी ऋषि के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिये गये थे। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य की सामाजिक एवं शैक्षणिक उपलब्धियां इस संस्कार के बाद ही सम्भव थी। यह सम्भव थी यह संस्कार आज भी हमारे समाज में प्रचलित है यह संस्कार अपने मूल स्वरूप को पूर्णतः त्याग चुका है इसमें ढेरों कर्मकाण्डों एवं लोकाचारों का समावेश हो चुका है।
समापवर्तन संस्कार गुरुकुल में शिक्षा को समाप्ति पर गुरूकुल में ही यह संस्कार सम्पादित किया जाता था। याज्ञवलक्य के अनुसार जब
विद्यार्थी गुरू के निकट रहकर अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेता था तब समापवर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार की एक विशिष्ट पद्धति थी जिनका विस्तृत विवरण गृहसूत्रों में मिलता है। समापवर्तन का शाब्दिक अर्थ- "शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर की और लौटना" होता है। इस संस्कार के सम्पादन की विधि का वर्णन गृहसूत्रों में मिलता है। इसके अनुसार एक शुभ दिन का चुनाव किया जाता था। उस दिन विद्यार्थी को एक कक्ष में वन्द्र कर दिया जाता था।
ऐसा इसलिए किया जाता था कि ब्रह्मचारी को तेज से कहीं सूर्य को दीप्ति कम न पड़ जाए। क्योंकि ज्ञान अर्जन के बाद ब्रह्मचारी जान हो जाता है। मध्यान्ह के समय ब्रह्मचारी गुरु को प्रणाम कर समिधा लाता था और हवन करता था। इस स्थान पर जल से भरे हुए आठ कलश रखे जाते थे। ये आठों दिशाओं में ब्रहाचारी के शान की वर्षा के प्रतीक थे। तब ब्रहाचारी उन कलश के जल से स्नान करता था अपने यश, ऐश्वर्य, शुचिता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता था। स्नान के बाद वह अपने दण्ड, मेखला, मृगचर्म आदि ब्रह्मचारी वेशभूषा का परित्याग कर देता था और एक नवीन कौपीन धारण करता था। बाल और नाखून का कर्तन होता था। आचार्य उसे वस्त्राभूषण, दर्पण, जल पुष्प आदि देते थे। यज्ञ होम कर यह कामना की जाती थी कि नवस्नातक को अधिक से अधिक शिष्य मिले।
समापवर्तन शिक्षा का अन्तिम पादान और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का प्रथम सोपान था इसलिए इस अवसर पर गुरू विद्यार्थी को कुछ आदेश देता था। वह उसे बताता था कि वह जीवन में धर्म का अनुसरण करे। स्वाध्याय के प्रति सदा सावधान रहे। आचार्य के लिए धन लाए और अपनी वंश परम्परा को प्रतिष्ठित करे। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवता रूप समझ कर उनकी सेवा करे। इस प्रकार अन्तिम उपदेश प्राप्त कर लेने के बाद आचार्य का आशीर्वाद और आदेश लेकर वह घर की ओर लौटता था।


