शिष्य का शिष्यत्व ही गुरु की पूजा
लेख - डॉ. प्रभु चौधरी
भारतीय संस्कृति विश्व की एक महान संस्कृति है। जिस संस्कृति ने विश्व को पावन प्रेरणा प्रदान की, प्रकाश स्तम्भ के रूप में पथ-प्रदर्शन किया और जिसकी उदार और उदात्त विचारधारा के कारण जन-जन का अन्तर मानस सदा ही उसके प्रति श्रद्धा से नत रहा और विश्वगुरु का गौरव प्राप्त हुआ । यही गुरुत्व गुरुपूजा का आधार है। आस्था, श्रद्धा व समर्पण भाव का प्रतीक यह गुरु पूर्णिमा गुरु के सम्मान का प्रतीक है।
गुरु पूर्णिमा अर्थात् आषाढ मास की पूर्णिमा के दिन इन्द्रभूति गौतम अपने अहंकार युक्त ज्ञान को लेकर प्रभु महावीर से साक्षात्कार एवं शास्त्रार्थ हेतु आए । किन्तु प्रभु महावीर ने उनकी स्थिति समझकर साक्षात्कार पूर्व में ही समाधान दे दिया। तब इन्द्रभूति गौतम महावीर के गुरुत्व के समक्ष नतमस्तक होकर शिष्यत्व को ग्रहण कर गुरु-शिष्य परम्परा को जीवन्त कर दिया। सनातन संस्कृति के अनुसार गुरु पूर्णिमा को वेदव्यासजी का जन्म हुआ इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं।
गुरु-शिष्य परम्परा का सम्बन्ध ज्ञानवृद्धि और साधनावृद्धि पर आधारित होता है जो एकमात्र पवित्र सम्बन्ध है सच्चा गुरु वही है जो भक्त को भगवान से जोड़कर स्वयं को बीच से हटा लेता है जैसे मूर्तिकार पत्थर से अनावश्यक सामग्री हटाकर मूर्ति तैयार कर देता है और फिर मूर्ति से अलग हो जाता है, वैसे ही गुरु-शिष्य को प्रभु तक पहुँचाकर स्वयं अलग हो जाता है, वही सच्चा गुरु होता है। जिसमें किसी प्रकार की अपेक्षा, प्रतिष्ठा, लाभ की प्राप्ति की चेष्टा नहीं होती है।
(1) गुरु प्रामाणिक हो- गुरु कैसा हो ? यह प्रश्न हमारे सामने आता है क्योंकि हम हर किसी को गुरु नहीं बना सकते। वह प्रामाणिक हो, निष्ठावान, श्रद्धावान, पंच महाव्रतधारी, प्रज्ञावान, विवेकशील, धीर गम्भीर हो। गुरु की पहचान कौन कर सकता है ? शिष्य ही गुरु की पहचान कर सकता है। जैसे- नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) ने कई गुरुओं की तलाश की। अन्त में भरी सर्दी में नदी में तैरकर रामकृष्ण परमहंस के पास पहुँचे। उन्हें परखा और अपना गुरु बना लिया। आज हम एक घड़ा खरीदने जाते हैं तब उसे कड़कोल्या मारकर आवाज को देखते हैं। कहीं वह फूटा हुआ तो नहीं है। ऐसे ही हमें सद्गुरु की भी परख करनी चाहिए। यदि शिष्य सच्चा है, पक्का है, पका हुआ है और परिपक्व है तो वह अपने गुरु की पहचान कर सकता है। शिष्य के पास गुरु को पाने की पात्रता का होना जरूरी है।
शिष्य के लिए आवश्यक है, वह देखे जिसकी आँखों में तेज झलक रहा हो। जिसका चेहरा दिव्य एवं स्वर्णिम आभा से आलोकित हो, जिसके सामने आने से हृदय के द्वार खुलने लगे और जिसके चरणों में श्रद्धावान होकर समर्पण करने का मन करें, जिनके मिल जाने पर और कुछ भी करने में मन नहीं लगे, जिनके सामने समस्त संसार तृणवत् नजर आने लगे। बस जिनके चरणों में ही सर्वस्व खो देने का मन करें। ऐसा जब कोई मिल जाए तो समझ लो वही तुम्हारा गुरु होगा।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर ।
गुरु साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
अर्थात् गुरु जन्मदाता, पालनकर्ता और शिखर तक पहुँचाने वाला तीनों रूपों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश है जो परम ब्रह्म तक पहुँचा देता है। यदि गुरु प्रामाणिक हैं और शिष्य अत्यन्त निष्ठावान है तो ही ज्ञान प्राप्त होता है। जैनदर्शन में गुरु को सन्त भी कहते हैं जो ममता रहित, निरंकार, निसंग, नम्र होता है और प्राणीमात्र पर उसके अन्तर मानस में समभाव की सरिता प्रवाहित होती है। चाहे लाभ हो, हानि हो, सुख के सरस सुमन महक रहे हो, चाहे दुःख के नुकीले काँटे चुभ रहे हो, चाहे प्रशंसा के गीत गाये जा रहे हो या निन्दा के भाव में रमण करता हो, उसे आसक्ति नहीं होती, वह सदा अनासक्त रहता है। वह न राग के प्रवाह में प्रवाहित होता है और न द्वेष के वह सदा सर्वदा सहिष्णु रहकर निजभाव में रमण करता है। विश्व के लिए इस प्रकार के सन्त या गुरु ही मंगल मूर्ति के रूप में होते हैं। उनके जीवन में सत्य व करुणा का अपार सागर प्रतिपल प्रतिक्षण उछाल मारता रहता है। कठिन से कठिन परीषह आने पर भी वह मेरुपर्वत की तरह अप्रकम्प रहता है, वह समुद्र के समान गम्भीर चन्द्र के समान शीतल, सूर्य के समान तेजस्वी, शेर के समान निर्भीक और पृथ्वी के समान सहनशील होता है। संसार की कोई भी भौतिक चकाचौंध उसके मन को आकर्षित नहीं कर सकती। सन्त का जीवन आश्चर्यो का लेखाजोखा नहीं किन्तु चेतना का उन्मेष होता है।
(2) गुरु शिष्य की संजीवनी गुरु का जीवन चरित्र उस संजीवनी की भांति होता है. जो मृत में भी जीवन का संचार करने का सामथ्र्य रखती है। गुरु का स्थान व महत्त्व समाज में सर्वोपरि है। गुरु ही शिष्य में ज्ञान अनुभूति, अनुशासन के साथ नई दिशा प्रदान करता है। अतः गुरु सदैव वन्दनीय है क्योंकि-
गुरु के उपदेश सू, मूरख ज्ञानी होय ।
लोहो तो सुवरण हुए, पारस पत्थर होय ।।
अर्थात गुरु के ( भलीभांति) उपदेश (शिक्षा-दीक्षा) से मूरख व्यक्ति भी ज्ञानी बन जाता है। जैसे पारस पत्थर के सम्पर्क से लोहा सोना बन जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा- विवेक, वैराग्य, गुरु के वाक्य पर विश्वास ये सब रहने पर कोई कष्ट नहीं है। अर्थात् गुरु शिष्य के लिए छत्र छाया है, जिसमें शिष्य निर्भय हो जाता है, चिन्ता मुक्त हो जाता है, जिम्मेदारी रहित हो जाता है। कहा भी है- जिसके सर पर गुरु का हाथ है. फिर डरने की क्या बात है। अर्थात् गुरु उस
वटवृक्ष की तरह होता है जो शिष्य को त्राण देने वाला एवं तारने वाला होता है। गुरु एक तरफ शक्ति का स्रोत होता है तो दूसरी तरफ भक्ति का आधार होता है। ही । गुरु तो मुक्ति का मन्त्रदाता होता है, साधकों का तारक एवं त्राता होता है। गुरु चेतना का सारथी, संस्कारों का संवाहक और प्रेम का प्रतिनिधि होता है। श्गुरु-पूर्ण माँर होता है। माँ भले ही निष्ठुर बनकर अपनी सन्तान को झाड़ियों में तड़फता फेंक देती है इसलिए जन्मदात्री माँ के ममत्त्व पर भी कलंक एवं प्रश्नचिह्न लग गया है, लेकिन गुरु जिनका प्रेम, उदारता और अपनत्व अनन्त होता है, जो तलहटी से शिखर तक पहुँचाने में रक्षक बनकर खड़े रहते हैं। गुरु शिष्य के अन्तर्मन में रहे, यह शिष्य की भक्ति है लेकिन विरले ही होते हैं जो गुरु के अन्तर्मन में शिष्य बनकर रहे, यह गुरु की संजीवनी है। शिष्य की श्रद्धा, भक्ति एवं समर्पण है ।
3) शिष्यत्व पाने की पात्रता- शिष्यत्व पाने के लिए शिष्य की योग्यता एवं पात्रता का होना जरूरी है। इसके लिए उसमें कृतज्ञता. समर्पण तथा श्रद्धा आवश्यक है। समर्पण जो स्वार्थ रहित हो, जो अन्ध श्रद्धा रहित हो, जिसमें जिज्ञासा हो तथा बोध प्राप्त करने की क्षमता हो क्योंकि शिष्य के समर्पण के अनुरूप ही गुरु की चेतना उसके जीवन में बोध बनकर प्रकट होती है। समर्पण जितना समग्र होता है, बोध उतना ही सम्पूर्ण होता है। शिष्य की पात्रता के लिए जरूरी है कि वह अपने अन्दर की जिज्ञासा को समर्पण में बदले। यह सच है समर्पण साधना का सारांश है तथा जन्म-जन्म की साधना का परिणाम अतः स्पष्ट है पात्रता विकसित होने पर ही गुरु मिलते हैं। गुरु ऐसे हो जो शिष्य को अपने व्यक्तित्व के आँचल में समेटकर परिशुद्ध करके परिमार्जित एवं परिशोधित कर दें।
गुरु और शिष्य का मिलन तो सामान्य परिचय होता है परन्तु गुरु द्वारा शिष्य को अपनाना तथा शिष्य द्वारा समर्पित होना, जो दोनों को बांधे रखता है। जब शिष्य गुरु के प्रति समर्पित हो जाता है तो गुण, मान्यताएँ प्रतिबन्ध में प्रगाढ़ता आने लगती है। धीरे-धीरे परिचय प्रेम में बदलने लगता है। जिसमें न कोई शर्त, न कोई प्रतिबन्ध, न कोई मान्यता बस गुरु के द्वारा दी गई प्रत्येक अवस्था शिष्य को स्वीकार होती है। किन्तु परन्तु को स्थान नहीं होता है। जब गुरु के सद्विचारों के साथ सुख व दुःख की अवस्था भी स्वीकार होती हैं तब समर्पण की यात्रा शुरु होती है। जब हम पूर्णरूप से अपने गुरु में एकाकार होने लगते हैं तो इसे किसी सीमा से नहीं बाँधा जा सकता। इस अनुभव से सद्गुरु व परमात्मा का घुलामिला सा स्वरूप उभरकर आता है।
जिज्ञासा और समाधान यह मन व चित्त की अनुभूति है। उसके मन मस्तिष्क में संख्यातीत प्रश्न बीज उर्वरित होते हैं। दृश्य- अदृश्य जगत की सत्ता को समझने के लिए प्रश्नों के समाधान के लिए वह उत्कण्ठा से भर जाता है और जहाँ जिज्ञासा चरम सीमा को स्पर्श करती है, वहाँ दर्शन का जन्म होता है, दार्शनिकता उद्भूत होती है, यही विरक्ति को उत्पन्न करती है। इन्हीं विचारधारा के आधार पर निर्जन वन का भयंकर मार्ग पार करने के साथ-साथ संसार की भयंकर अटवी का मार्ग पार करने का निश्चय करता है तथा अन्ततः गुरु के प्रति पूर्णतरू समर्पित हो जाता है। यही शिष्य द्वारा दिया गया प्रतिदान है तथा उसके द्वारा की जाने वाली पूजा ।
(4) गुरु शिष्य के शिल्पकार एवं तराशने वाले होते हैं-गुरु वो होते हैं जो शिष्य के अनगड़ जीवन को तराशकर उसे किसी कलाकृति में दाल देते हैं। वे शिष्य के शिल्पी होते हैं। इसलिए कहा है- श्गुरु कुम्हार सिस कुम्भ हो वे बाहर से कठोर अनुशासन में रखते हैं लेकिन भीतर में सहारा बनते हैं जिस तरह कुम्भकार कच्चे घड़े के बाहर से एक हाथ से पीटकर पक्का करता है लेकिन भीतर में दूसरे हाथ से सहारा देता है। किसी कवि ने कहा है-
गुरु कारीगर सरीखा घट-घट काढ़े खोट ।
अन्दर से रक्षा करें उपर मारे चोट ।।
गुरु का जीवन में वही स्थान है जो घनघोर अरण्य में प्रकाशदीप का होता है। गुरु और प्रकाश एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। दोनों गुमराह होने से बचाने का रास्ता बताते हैं। सही समय पर गुरु का योग मिल जाना शिष्य की महान पुण्यवानी का सूचक हैं। गुरु बचपन में मिल जाये तो शिष्य संसार सागर में फँसने से बच जाता है। गुरु गृहस्थ को जवानी में मिल
जाये जो उसे गृहस्थ में जल कमलवत् जीना सीखाते हैं और गुरु जब बुढ़ापे में मिल जाये तो मन को भक्ति में रमाकर बुढ़ापे को सुधार देते हैं। इसलिए गुरु किसी भी मोड़ पर मिले पर मिले जरूर पुण्यशाली हैं वो शिष्य जिन्हें किसी न किसी मोड़ पर गुरु जरूर मिलते हैं।
(5) गुरु अनन्त अस्तित्व की सहज व्याख्या गुरु अनन्त अस्तित्व की सहज व्याख्या होती है। उनकी वृत्ति, प्रकृति एवं प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति होती है। उनकी साधना में सृजन, सृजन में साधना का दीप प्रज्वलित होता है। जिसके आलोक में कई भटके चरण विश्रान्ती पाते हैं। जब हजारों-हजार भटके चरण किन्हीं चरणचिह्नों में अपनी नियति के दर्शन करते हैं तो वे चरण उपास्य व अभिनन्दनीय होते हैं। उपासना, अर्चना, अभिवन्दना, व्यक्तित्व की नहीं, कृतित्त्व की होती है। उनके गुरुत्व की होती है क्योंकि गुरु किसी पदचिह्नों पर चलने के स्थान पर स्वयं अपने पदचिह्न बनाते हैं।
सद्गुरु का जीवन मानसरोवर के तुल्य हैं। इनकी महिमा अनन्त है उसे शब्दों में समेटना सम्भव नहीं है। जीवन की सर्वोच्च ऊर्जा और सर्वोच्च सच उनके अन्तचक्षुओं के समक्ष उपस्थित होते हैं। सद्गुरु में शिष्य को परमेश्वर की मुस्कान के दर्शन होते हैं। सद्गुरु के दर्शन में वह परम ब्रह्म के दर्शन कर लेता है। ऐसे ही सद्गुरु स्व-नाम, धन्य, यशस्वी, तपस्वी, वर्चस्वी, मनस्वी, ओजस्वी तथा तेजस्वी गुणमय व्यक्तित्व के धनी होते हैं।
श्रद्धेय श्री गौतममुनिजी म.सा. के अनुसार आज के परिप्रेक्ष्य में सच्चे गुरु का मिलना दुर्लभ है। गुरुकृपा प्राप्त करना और भी दुर्लभ है मगर गुरु पर श्रद्धा रखना सबसे अधिक दुर्लभ है। यही श्रद्धा शिष्य के विकास का, प्रगति का इतिहास रचती है। गुरु कभी चमत्कार नहीं करते। जो भी चमत्कार होता है, वह शिष्य की श्रद्धा और समर्पण के आधार से होता है। गुरु के पास आशीर्वाद की कोई कमी नहीं होती। जितनी गहरी श्रद्धा उतना ही आशीष मिलता है। वहीं शिष्य गुरु से कुछ अर्जन में सफल हो सकता है। जिसके पास जिज्ञासा का भाव हो, समर्पण और श्रद्धा का भाव हो । शिष्य की पहचान तो कृतज्ञता से होती है। शिष्यत्व का अर्थ है गहन विनम्रता । शिष्य वही होता है जो अपने को झुकाकर स्वयं के हृदय को पात्र बना लेता है। ऐसी समर्पण की साधना होती है जो अपने गुरु चरणों में समस्त अहंकार भाव को विसर्जित कर देता है। जो तत्त्व को पाने के लिए तैयार और तत्पर रहता है। सत्य को समझने के लिए प्रतिबद्ध रहता है। उसका मन लालसाओं के लिए नहीं ललकता, उसकी चेतना कामनाओं से कीलित नहीं होती, वासनाओं के पाश उसे कभी नहीं बाँधते । वह अपनी अनघड़ प्रकृति को सुघट और सुसंस्कृत करने की प्यास रखता है तथा गुरु के अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है। गुरु पूर्णिमा यही सन्देश देती है हम अच्छे गुरु को प्राप्त करने के लिए अपने शिष्यत्व को जगाएँ तथा कृतज्ञता का भाव लेकर गुरु शरण पाये ।
लेख - डॉ. प्रभु चौधरी
15, स्टेशन मार्ग, महिदपुर रोड़ जिला उज्जैन (म.प्र.)


