टाटा परिवार के सहयोग से ही सामने आया था पाटलिपुत्र का सच
आगराः टाटा समूह के मानद प्रमुख पद्म विभूषण रतन टाटा के निधन से देश में शोक की लहर है। टाटा परिवार ने देश को आर्थिक रूप से सबल बनाने के साथ ही देश के गौरवशाली इतिहास को उजागर करने में भी अमूल्य सहयोग किया था। पाटलिपुत्र का सच टाटा परिवार (Tata Family) के योगदान से ही सामने आ सका था।
टाटा समूह के संस्थापक जमशेद जी टाटा के छोटे बेटे रतन जी टाटा अगर सहयोग नहीं करते तो मौर्य वंश की राजधानी रही पाटलिपुत्र का सच सामने नहीं आ पाता। लेखक हरीश भट्ट ने अपनी किताब 'टाटा स्टोरीजः 40 टाइमलेस टेल्स टू इंस्पायर यू' में वर्ष 1913 में हुई देश की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोज का जिक्र किया है।
वर्ष 1780 में पटना और पाटलिपुत्र में संबंध निकालने की कोशिश पुरातत्वविदों ने की थी। 1885 में वहां खोदाई की गई। बड़े क्षेत्र में उत्खनन कराने पर वर्ष 1903 तक ब्रिटिश सरकार सहमत नहीं थी। वर्ष 1912 में रतन जी टाटा ने पुरातात्विक उत्खनन को समर्थन का संकेत दिया तो पाटलिपुत्र को चुना गया। उस समय उन्होंने 20 हजार रुपये प्रतिवर्ष देने पर सहमति जताई थी।
अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. राजकुमार पटेल ने बताया कि टाटा और ब्रिटिश सरकार के बीच शर्तों पर सहमति बनने के बाद अमेरिकी पुरातत्वविद डीबी स्पूनर ने वर्ष 1913 में उत्खनन किया। इसके बाद पाटलिपुत्र में 10 फीट नीचे प्राचीन दीवार मिली। अगले चार वर्षों में सिक्के, टेराकोटा की मूर्तियां और 100 स्तंभों वाला सम्राट अशोक का सिंहासन कक्ष सामने आया। प्रोजेक्ट को उस समय उन्होंने 75 हजार रुपये दिए थे। उनका निधन वर्ष 1918 में 47 वर्ष की उम्र में हो गया था। पाटलिपुत्र के उत्खनन में मिले पुरावशेष राष्ट्र की धरोहर हैं।


