मनुस्मृति क्या है ?
मनुस्मृति : प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक ख्यातिलब्ध साहित्यों में मनु स्मृति की भी गणना की जाती है। स्मृतियों में इसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण और पुरातन माना जाता है। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2685 श्लोक हैं। मनुस्मृति के रचनाकार मनु हैं। लेकिन इसके रचनाकार के सन्दर्भ में 'अत्यन्त विवाद है। अधिकांश विद्वान मनुस्मृति का लेखक स्वायम्भु मनु को मानते हैं। लेकिन कुछ विद्वान वैवस्वस मनु, भृगु और ब्रह्मा द्वारा विरचित भी मानते हैं। मनु नाम अत्यन्त पुरातन है। इनका उल्लेख ऋग्वेद में भी अनेक स्थलों पर हुआ है।
मनु का काल पुरातन
इसलिए विद्वान मनु का काल पुरातन मानते हैं। लेकिन आज सामान्य रूप से यह स्वीकार किया जाता है कि मनुस्मृति ई०पू० द्वितीय शती की रचना हो सकती है। मनुस्मृति एक विधिसंहिता या दण्डनीति सम्बन्धी ग्रन्थ है। इसके 12 अध्यायों में विभिन्न विषयों सम्बन्धी विधि या नियम बताए गये हैं। इसके प्रथम अध्याय में जगत उत्पत्ति, काल परिमाण, चारों वर्णों के कर्म, धर्मोत्पत्ति आदि का वर्णन है। द्वितीय में कुछ संस्कार और ब्रह्मचर्य आश्रम तथा तृतीय में समावर्तन, गृहस्थ आश्रम, पन्च यज्ञ आदि का वर्णन है। चौथे अध्याय में आजीविका, और पांचवे में भक्ष्याभक्ष्य, शुद्धि, पत्नी धर्म का वर्णन है। षष्ठम् में वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम का विस्तृत वर्णन है। सातवां अध्याय राजधर्म सम्बन्धी नियमों से पूर्ण है। अध्याय आठ और नौ में राजधर्म के अन्तर्गत व्यवहार निर्णय विषयों का प्रतिपादन किया गया है। दशवें अध्याय में वैश्य और शूद्र के धर्मों का वर्णन है।
ग्यारहवां अध्याय
ग्यारहवां अध्याय प्रायश्चित विषय से सम्बन्धी है। इसके अन्तिम और द्वादश अध्याय में कर्मफल विधान एवं निःश्रेयस कर्मों का वर्णन है। प्राचीन भारत के सामाजिक इतिहास के स्रोत के रूप में मनुस्मृति का बहुत अधिक महत्व है। प्राचीन भारतीय समाज और परिवार से सम्बन्धित सारी संस्थाओं और उनके नियमों का विस्तृत विवरण इसमें मिलता है। यह वर्णों, जातियों, पुरूषार्थी, आश्रमों, संस्कारों को विस्तृत रूप में प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ है। इसके बताए गये अधिकांश नियमों का पालन तत्कालीन समाज और परिवार में किया जाता था। इसमें तत्कालीन समाज में स्त्रियों की दशा पर भी प्रकाश पड़ता । तत्कालीन न्याय प्रणाली और विधि का ज्ञान भी इस स्मृति से हमें प्राप्त होती है। यह ग्रन्थ मात्र सामाजिक ही नहीं अपितु राजशास्त्र से भी सम्बन्धित है। राजधर्म सम्बन्धी विवरणों के कारण ही इसे 'दण्डनीति' भी कहा जाता है। इसमें राज्य उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का वर्णन मिलता है।
राजा के कर्तव्य के साथ-साथ मन्त्रिमण्डल
इसमें राजा के कर्तव्य के साथ-साथ मन्त्रिमण्डल, विधि आदि का भी वर्णन है। इसमें दिवानी और आपराधिक दोनों प्रकार के कानूनों और न्यायालयों की गतिविधियों का वर्णन प्राप्त होता है। परिवार से सम्बन्धित विभाजन और दाय भोग से सम्बन्धित विधियों का भी विस्तार से वर्णन है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनु स्मृति अपने युग के सामाजिक, राजनीतिक, विधिक, पारिवारिक गतिविधियों का प्रधान ग्रन्थ है।

