9 की उम्र में छोड़ा घर, 19 में ‘क्रांतिकारी साधु’ बने: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 99 साल की उम्र में निधन, राम मंदिर के लिए लड़ी थी लंबी लड़ाई
मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर में आज (11 सितंबर 2022) शारदा एवं द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया। उन्होंने 99 साल की आयु में दोपहर 3:30 बजे अपने झोतेश्वर स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में अंतिम साँस ली।
काशी ने बनाया क्रांतिकारी साधु को शंकराचार्य
शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का रविवार को नरसिंहपुर में निधन हो गया।
बेबाक बयानों के लिए जाने जाते थे
स्वरूपानंद धर्म के साथ राजनीतिक मुद्दों पर भी बेबाक राय रखते थे। उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को लेकर सरकार पर भी सवाल खड़े कर दिए थे। कहा था कि भगवा पहन लेने से कोई सनातनी नहीं बनता। साईं बाबा की पूजा को गलत ठहराने वाला बयान उन्होंने पहली बार हरिद्वार में ही दिया था। जिसके बाद पूरे देश में विरोध शुरू हो गया था।
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| स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (तस्वीर साभार: अमित शाह का ट्विटर) |
फर्जी शंकराचार्यों के खिलाफ थे स्वरूपानंद
स्वरूपानंद हमेशा फर्जी शंकराचार्यों के खिलाफ रहे हैं। 2010 के महाकुंभ में कुछ तथाकथित शंकराचार्य के स्नान को लेकर भी विवाद हो गया था और फर्जी शंकराचार्य को स्नान का समय नहीं दिया गया था। वहीं 2013 की आपदा के बाद शंकराचार्य ने केदरनाथ और शंकराचार्य की समाधि जीर्णोद्धार का मुद्दा उठाया था।
आजादी से लेकर राम मंदिर संघर्ष तक मुखर रहे स्वरूपानंद
ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ और द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य ने रविवार को शरीर छोड़ दिया। वह देश की आजादी की लड़ाई में जेल गए तो राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर भी दशकों तकमुखर रहे। स्वामी स्वरूपानंद का जन्म 1924 में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने घर-बार छोड़ दिया। वर्ष 1950 में दंडी संन्यासी बन गए तभी से वे स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। उन्हें 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। राम मंदिर निर्माण के लिए भी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। शंकराचार्य स्वरूपानंद ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों का भी सामना किया था।
शीर्ष पीठों के शंकराचार्य
शंकराचार्य हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है। करीब 1300 साल पहले आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने हिंदुओं और धर्म के अनुयायी को संगठित करने और धर्म के उत्थान के लिए पूरे देश में चार धार्मिक मठ बनाए थे। उत्तरांचल के बद्रिकाश्रम में ज्योतिष्पीठ, रामेश्वर में वेदांतपीठ (शृंगेरी ज्ञानमठ), गुजरात के द्वारकाधाम में शारदापीठ और ओडिशा के पुरी में गोवर्धन पीठ। इनमें बद्रीनाथ और शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती थे। शंकराचार्य का 99वां जन्मदिन हरियाली तीज के दिन मनाया गया था।
अरविंद मिश्र
वाराणसी। ज्योतिष एवं द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का व्यक्तित्व निर्माण काशी में हुआ। अपने संन्यासी जीवन का 76वां और अंतिम चातुर्मास परमहंसी गंगा आश्रम में करने वाले स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने पहला चातुर्मास काशी में गंगा किनारे किया था।
वह मात्र नौ वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर विद्याध्ययन के लिए काशी आ गए थे। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का सबक पढ़ने से लेकर संन्यासी रूप में सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प काशी के सुयोग्य गुरुओं से मिला।
दिघोरी से निकला था नौ वर्ष का पोथीराममध्यप्रदेश में सिवनी जिला के दिघोरी गांव से चला नौ वर्षीय बालक पोथीराम (बचपन का नाम) मार्ग के विभिन्न तीर्थों से होते हुए पदयात्री के रूप में लहुरी काशी (गाजीपुर) पहुंचा था। वहां की रामपुर पाठशाला में अध्ययन आरंभ किया। अपनी मेधा और धर्मानुराग के चलते वह जल्दी हेडमास्टर पं. देवकीनंदन के अत्यंत प्रिय हो गए। उन्हीं की सलाह और मार्गदर्शन में एक वर्ष बाद वह काशी आए। यहां उन्हें धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री महाराज एवं स्वामी महेश्वरानन्द महाराज जैसे श्रेष्ठ विद्वान और संतों का सानिध्य मिला। इन दो महान संतों की देखरेख में पोथीराम वेद-वेदांग, शास्त्रत्त्-पुराणेतिहास सहित स्मृति एवं न्याय ग्रन्थों का विधिवत अनुशीलन करते रहे।
कुछ वर्षों तक काशी में अध्ययन करने के बाद क्रांतिकारी गतिवियों के संचालन के लिए 1940 के आसपास पोथीराम पुन गाजीपुर लौटे। यहां उन्होंने बभनौली गांव के बाहर कुटिया में निवास किया। इसी बीच वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का घोष हुआ तो युवा तपस्वी पोथीराम भी उस धारा में प्रवाहमान हो गए। मात्र 19 वर्ष की अवस्था में वह ‘क्रांतिकारी साधु’ के रूप में पूरे पूर्वांचल में प्रसिद्ध हो गए थे।
स्वामी करपात्री महाराज द्वारा स्थापित रामराज्य परिषद् पार्टी के अध्यक्ष के रूप में स्वामी स्वरूपानंद ने सम्पूर्ण भारत में रामराज्य लाने का प्रयत्न किया। हिन्दुओं को उनके राजनैतिक अस्तित्व का बोध कराया। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम महाराज के ब्रह्मलीन होने पर सन् 1973 में अनेक संतों, विद्वानों ने उनका ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद पर अभिषेक किया।
प्रियंका गांधी व अखिलेश यादव ने शोक प्रकट किया कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया, जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के महाप्रयाण का समाचार सुनकर मन को भारी दुख पहुंचा। स्वामी जी ने धर्म, अध्यात्म व परमार्थ के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
उधर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी शंकराचार्य के निधन पर दुख जताया है।
● साईं बाबा की पूजा को ठहराया था गलत
● केदरनाथ व शंकराचार्य की समाधि के जीर्णोद्धार का अभियान छेड़ा था।
सीएम ने दुख जताया
शंकराचार्य स्वरूपानंद के निधन पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से दुख जताया। उन्होंने ट्वीट किया, भगवान शंकराचार्य द्वारा स्थापित पश्चिम आम्नाय श्रीशारदापीठ के पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्राणांत की सूचना अत्यंत दुखद है।


