सिंधु क्षेत्र के बाहर ग्रामीण तथा कृषक समुदाय
प्रस्तावना
नवपाषाण अवस्था-नवपाषाण संक्रमण काल में भू-उपयोगिता की तुलना मे तकनीकी परिवर्तन कम प्रभावकारी रहा। मनुष्य ने आखेटक तथा खाद्य संग्राहक के रूप में हजारों वर्ष जीवन व्यतीत किया।
हजारों वर्षों तक आखेटक तथा खाद्य संग्राहक का जीवन व्यतीत करने के पश्चात लोग गांवों में बसने लगे और कृषक तथा पशुपालक का जीवन व्यतीत करने लगे। यह संयोग की बात है कि, व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने तथा पशुओं के पालतू बनाने के क्रम में मनुष्य गेहूं, जौ, भेड़ तथा बकरी इत्यादि के संपर्क में आया। सबसे पहले इसके अवशेष दक्षिण एशिया के मेहरगढ़ में (6000 ई.पू.) पाए गए हैं।
दक्षिण एशिया में ऐसी कोई निश्चित अवधि का पता नहीं चला है जिससे यह माना जाए कि इस समय में आखेटक तथा खाद्य संग्राहक की जीवन शैली छोड़कर लोग कृषि तथा पशुपालन करने लगे थे। नवपाषाण युग विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार से, विभिन्न स्तरों पर एक विशेष प्रकार के पत्थर और मृद भांड की तकनीक तथा अलग-अलग तरह के पशुओं के साथ हुआ।
कच्छी मैदानी क्षेत्रों की तरह विध्य पठार की बेलन घाटी तथा गंगा के मैदानी क्षेत्रों में इलाहाबाद का इलाका काफी महत्वपूर्ण है। यहां हमें पुरापाषाण युग, मध्य पाषाण युग तथा प्रारंभिक नवपाषाण युग के घटनास्थल एक क्रम में मिले हैं। यहां से हमें चावल के अवशेष तथा कूबड़ वाले पशुओं के पालतू होने का संकेत भी मिला है। संक्रमण काल की अवधि अभी विवाद का मुद्दा बनी हुई है।
ताम्र पाषाणिक युग- हड़प्पा सभ्यता के पश्चात हमें ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों का एक अनुक्रम मिला है जो 2,000 ई.पू. की हैं और जो भौगोलिक रूप से उदयपुर के उत्तर-पूर्व में स्थित बनास तथा बेचान दोआब से होते हुए मालवा और पश्चिम महाराष्ट्र में भीमा घाटी तक गई हैं। इस प्रकार यह संभव है कि हम लगभग एक शताब्दी तक महत्वपूर्ण क्षेत्रों खासकर पश्चिमी मध्य भारत में प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक विकास और उनके विचारों के आदान-प्रदान का अध्ययन कर सके और उनके आधार पर 'दक्षिणी नवपाषाणिक' बस्तियों के विकास स्थल कृष्णा तथा तुंगभद्रा का भी अध्ययन कर सकें।
प्रारंभिक लौहावस्था-जिस तरह व्यवस्थित ग्रामीण जीवन शैली के उदय में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूप धारण किए, वैसे ही लोहे के प्रयोग ने विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरीकों से लोगों की जीवन शैली को प्रभावित किया। दक्षिणी एशिया के छह प्रमुख क्षेत्रों से लोहे के प्रयोग की प्राचीनता को जानने के लिए एक सर्वेक्षण (Survey) किया गया जिससे यह पता चला कि आर्यों के आगमन का लोहे के प्रयोग से कोई संबंध नहीं है। जिन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया है उनसे यह पता चलता है कि यहां पर काफी मात्रा में लौह-अयस्क (जी आसानी से पिघलाया जा सकता था) पाया गया है।
रेडियो कार्बन पद्धति से पता चला है कि मालवा क्षेत्र में लगभग 1100 ई.पू. में लोहे का प्रयोग आरंभ हो गया था। यह बात इस आधार पर कही गई है कि मालवा में ताम्र पाषाणिक युग के पश्चात् लौहावस्था आई थी। प्राप्तः साक्ष्य बतलाते हैं कि दोनों अवस्थाओं में एक निरंतर संबंध है। मालवा में ताम्र पाषाणिक युग का अंत लगभग 1300 ई.पू. में हुआ।
लोहे के प्रथम प्रयोग का एक निश्चित स्थान या क्षेत्र खोजना बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न | नहीं है क्योंकि बहुत कम ही रेडियो कार्बन तिथि उपलब्ध हैं। यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि किसी एक क्षेत्र विशेष में लोहे का प्रयोग नहीं हुआ होगा अपितु कुछ शताब्दियों के अंदर ही बहुत सारे समुदायों ने लोहे का प्रयोग शुरू कर दिया होगा।
यह स्पष्ट है कि लोहे के अगणित प्रयोग गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में मिलते हैं। इन स्थलों पर जनसंख्या का दबाव उत्तरी हड़प्पा की तुलना में ज्यादा था। मगध के राजतंत्रों तथा कोशल और उत्तरी गणराज्यों का उदय ऊपरी लौहावस्था के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है।
पुरातत्वविद् उत्तर भारत में लौह तकनीक के प्रयोग, बस्तियों के बनने के
आधारभूत तत्वों तथा राजनैतिक विकास के मध्य संबंध का अध्ययन कर रहे हैं।
भौगोलिक ढांचा तथा पशुपालकों और कृषक समुदायों की विशेषताएं (2000-500 ई.पू.)
उत्तर-पश्चिम सीमांत तथा कश्मीर-यह क्षेत्र तीन खंडों में बंटा हुआ है-पेशावर तथा तक्षशिला के बीच का क्षेत्र जिसमें पेशावर घाटी तथा पोतवार का पठार सम्मिलित है, स्वात तथा चिहरा के बीच का क्षेत्र और कश्मीर की घाटी। पोतवार पठार के सरायखोला का नवपाषाणिक स्तर कोटदीजी से संबंधित जानकारी देता है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि यह सारा क्षेत्र तत्कालीन हड़प्पा से व्यापारिक स्तर पर जुड़ा था।
स्वात- चिहरा क्षेत्र में अनेक पुरातात्विक स्थान मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं। कि यहां के लोग विभिन्न प्रकार की धातु, पत्थर तथा अन्य चीजों का इस्तेमाल करते थे जिनमें शंख, मूंगा तथा हाथी दांत संभवतः इस क्षेत्र में सिंधु घाटी से आया था। घनीगई का पत्थरनुमा स्थान, जो करीब-करीब 3000 ई.पू. का है, स्वात-चितरा की आधारशिला के बारे में बताता है।
इस क्षेत्र से प्राप्त " आद्य ऐतिहासिक कब्रिस्तान" 2000 ई.पू. का है। ऐसे कब्रिस्तानों का प्रमाण तथा संबंधित बस्तियों को "गांधार कब्र संस्कृति" के नाम से जाना जाता है और ये कब्रिस्तान लोचपूर्ण तथा कलशस्वरूप (फ्लेक्स्ड तथा अर्न) शवाधान से तथा ताम्र पाषाणिक युग से संबंधित हैं।
कब्रिस्तान तथा संबंधित बस्तियों का अध्ययन कई स्थानों पर किया गया है जिनमें मुख्य है-लेखनर, अलीग्राम, बीरकोट सुन्दाई, खेराटी, लालबटाई... तिमारगढ़ बालाम्यात कालको दौरेय तथा जरीफ करुणा जो चितरा स्थात, दिर बत्तर इत्यादि घाटियों में स्थित हैं।कश्मीर में तीस से अधिक नवपाषाणिक स्थल पाए गए हैं जिनमें से अधिकतम बारामूला तथा श्रीनगर खंड क्षेत्रों में पाए गए हैं। इतने बड़े क्षेत्रों में इनका विस्तार इस बात की ओर संकेत करता है कि यहा को संस्कृति मैदानी क्षेत्रों में पाई गई संस्कृतियों से भिन्न नहीं है। गुफ्करल का एसिरमिक एसिमिक (acimic) युग यह बताता है कि इस समय तक छोटे तथा बड़े-बड़े रहने वाले कमरों का निर्माण हो चुका था। सिले तथा बड़े कमरों का निर्माण पहले के युगों में भी पाया गया है। बाद के युगों में दो कमरों वाला मकान भी मिलता है। चटाईनुमा आधार वाले हाथ से बने हुए भूरे रंग के बर्तन कश्मीर के नवपाषाणिक युग की एक विशेष कृति है। इस प्रकार के बर्तन गुफ्करल तथा बुर्जहोम में पाए गए। कश्मीर का नवपाषाणिक युग दो हज़ार ई.पू. के मध्य तक महापाषाणिक युग में परिवर्तित हो गया था।
उत्तर-पूर्वी राजस्थान जोधपुरा का बड़ा सा टोला मिला है जो ज्ञानेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का पहला साक्ष्य है। यह टीला चौथी तीसरी शताब्दी ई.पू. का लगता है।
पुरातत्वविदों ने ज्ञानेश्वर का पुनः खनन किया और वहां काफी संख्या में इस तरह के (करीब 83 की संख्या में) पाए गए जो उत्तर-पूर्व राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों-सीकर, जयपुर तथा चुरू जिलों में स्थित है। उत्तर-पूर्वी राजस्थान का महत्व तांबे के खनन तथा संबंधित कार्यों के कारण है। ज्ञानेश्वर, जो 3 या 4 एकड़ से बड़ा क्षेत्र नहीं है, वहां से लगभग 2000 तांबे से निर्मित साक्ष्य मिले हैं और जब ऐसे 83 घटनास्थल हो तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां पर तांबे का इस्तेमाल किस स्तर पर हुआ होगा।
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान-दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के तीन ताम्र पाषाणयुगीन क्षेत्रों- अहार, गिलुन्द तथा बालाधल का सही ढंग से पुरातत्वविदों ने अध्ययन किया है जो वहां की बनास, बेरॉच तथा उसकी सहयोगी नदियों द्वारा जल प्राप्त करते थे।
अहार संस्कृति की बड़ी विशेषता यह है कि यहां के लोग तांबे की धातु-विद्या से परिचित थे। अहार में उपस्थित खनिज उरेहित मनका, लेपिस-लेजुली तथा रंगपुर जैसे आकर्षक लाल बर्तन इस बात को दर्शाते हैं कि इनका संबंध गुजरात स्थित हड़प्पा संस्कृति से रहा होगा। दूसरी ओर, इस संस्कृति का विस्तार मालवा की तरफ और दक्कन तक (जैसे-अहार में महाराष्ट्र का जोर्वे बर्तन) भी था।
मालवा-मालवा में 100 ताम्र पाषाणिक स्थल पाए गए हैं। साक्ष्य बतलाते हैं कि नवादाटोली एक नाभिकीय बस्ती थी। ईरान की बस्तियों से अलग ही चित्र उभरता है। ईरान के तीन ओर बीना नदी और चौथी ओर परकोटा तथा खड्ड था। परकोटे के निर्माण की दो अवस्थाएं थीं जो ताम्र पाषाणिक युग के मध्य में बनाया गया था। मालवा के किसी भी अन्य क्षेत्रों से परकोटे (Rampart) के साक्ष्य नहीं मिले हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रकार के मृद्भांड है-लाल पर काले रंग का मृदभाव, जो अन्य प्रकार के काले तथा लाल मृद्भांड से मिलते थे। ताम्र पाषाणिक फलक का प्रयोग इस काल में प्रायः होता था। तांबे के प्रयोग का साक्ष्य कम मिला है यद्यपि नवादाटोली में तांबे की बनी चौड़ी कुल्हाड़ी मिली है। विभिन्न चीज़ों से बने हुए मनका शिल्प काफी पाए गए हैं। नवादाटोली में कई तरह की फसल भी पैदा की जाती थीं। मालवा संस्कृति, नवादाटोली की तरह ही दी गई तिथि यानी दूसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य में पड़ती है लेकिन सबसे विशेष बात मालवा में प्रौढ़ हड़प्पा का पाया जाना है। मालवा की ताम्र पाषाणिक संस्कृति के अध्ययन के दौरान अग्निकक्ष तथा दंगवाड़ा में मंदिर पाए गए हैं जिसमें सांड की पूजा तथा लिंग पूजा के भी साक्ष्य मिले हैं।
महाराष्ट्र-प्रारंभिक बस्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाली सवाल्दा संस्कृति ताप्ति और गोदावरी नदियों के बीच में स्थित है। इस संस्कृति का उद्गम संभवतः तीसरी शताब्दी के अंत तथा दूसरी शताब्दी ई.पू. के प्रारंभ में हुआ था।
महाराष्ट्र में पाए जाने वाले प्रौढ़ हड़प्पा के अवशेष सवाल्दा संस्कृति के क्षेत्र में पाए गए हैं। सिंधु सभ्यता की लिपि जो दायमाबाद में पाई जाती है, उससे इसकी पहचान की धारणा विवादास्पद हो गई है।
दायमाबाद की तीसरी अवस्था को "दायमाबाद संस्कृति" के नाम से जाना जाता है। मालवा सांस्कृतिक अवस्था दायमाबाद की चौथी स्थिति को प्रदर्शित करती है। इस काल से संबंधित अनेक साक्ष्य मिले हैं। जोवें अवस्था से संबंधित साक्ष्यों का अध्ययन किया गया है। जोर्वे में लगभग 200 बस्तियों का 'वर्णन' मिला है, जिसमें से अधिकांश गांव 1 से 3 हेक्टेयर तक के थे।
इनाम गांव में जाहावे संस्कृति की प्रारंभिक अवस्था में सिंचाई सुविधा के साक्ष्य मिले हैं तथा मुख्य आबादी वाले क्षेत्र के पश्चिम में एक बांध भी मिला है। हस्तचालित हल तथा बीज बोने वाली मशीन प्रयोग में लाई जाती थी। मृद्भांड, सोने के गहने, तांबे व मिट्टी की बनी मूर्तियां, पशुओं तथा अग्नि की पूजा इत्यादि के संकेत जो ताम्र पाषाणिक युग के गांव की जीवन शैली से मिलता है, वे सभी महाराष्ट्र की इस जोर्वे संस्कृति में पाए गए हैं। इस संस्कृति का अंत लगभग 1000 ई.पू. या उसके बाद हुआ।
दक्षिणी भारत-यह क्षेत्र "दक्षिणी नवपाषाणिक संस्कृति" के नाम से जाना जाता है, जो भौगोलिक विचित्रता के साथ तीन "राज्यों" के मिलने से बना है। इसमें कर्नाटक का पठारी भाग है जो तमिलनाडु के उत्तर-पश्चिमी भाग तथा आंध्र प्रदेश के तेलंगाना और रायलसीमा के बीच का दोआब है। यहां अध्ययन का मुख्य केंद्र दक्षिणी नव पाषाणिक संस्कृति है क्योंकि यहां ऐतिहासिक अनुसंधान की एक लंबी परंपरा रही है और चर्चा का मुख्य विषय नवपाषाणिक युग का राख भरा टीला तथा उनकी बस्तियों की भौगोलिक स्थिति रही है।
इस क्षेत्रका एक बड़ा हिस्सा दो दोआवों से आता है- पहला, रायचूर का दोआब जो कृष्णा और तुंगभदा नदियों के बीच पड़ता है, दूसरा, सोगपुर का दोआब जो भीमा तथा कृष्णा नदियों के बीच पड़ता है। कुछ स्थल तुंगभद्रा नदी के पूर्व में भी पाए गए हैं। नवपाषाणिक स्थल इस क्षेत्र में काफी है, अकेले टेक्कलकोटा में उन्नीस नवपाषाणिक स्थल पाए गए हैं। इस क्षेत्र में ग्रेनाइट वाली बड़ी पहाड़ी तथा नदियों का किनारा संभवत: नवपाषाणिक लोगों के विकास के लिए एक बड़ा ही उपयुक्त स्थल था। अग्रलिखित मुख्य स्थलों का पुरातात्विक उत्खनन किया गया है-ब्रह्मगिरि, मस्की, पिक्लीहल, उत्तनूर, कुपगल, हल्तुर, नागार्जुनकोंडा, वीरापुरम, रामापुरम, हेम्मिगे, संगानाकल्लू, पल्लाओ, पायमपल्ली, टेक्कलाकोटा, कोडेकल, बनहल्ली इत्यादि।
आंध्र प्रदेश में ताम्र पाषाणिक संस्कृति काफी विस्तृत स्तर पर पाई गई है। कुरनूल क्षेत्र में विभिन्न स्थल मिले हैं। सिगनापल्ली एक ऐसा सांस्कृतिक क्षेत्र है जहां से काफी मात्रा में रंगीन बर्तन, पत्थरों के बने हुए फलक आदि पाए गए हैं। आंध्र नवपाषाणिक संस्कृति संभवतः तमिलनाडु तथा कर्नाटक की संस्कृतियों के अनुरूप है।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र तथा दक्षिणी पठार के मध्य के क्षेत्र में मृतकों के दफनाने के विभिन्न तरीके (Megaliths ) पाए गए हैं। दफनाने की पद्धति ऐतिहासिक काल में भी काफी विस्तृत क्षेत्र में अपनाई जाती रही है और इसमें कई तरह की मेगालिथिक आकृतियां, जैसे-टोलानुमा वृत्त, महापाषाण तुंब, इत्यादि भी विभिन्न तरीकों से प्रयोग में लाई जाती रही हैं।
• अभी तक गलती से ऐसा माना जाता था कि मेगालिथ इस क्षेत्र का एक स्वतंत्र सांस्कृतिक क्षेत्र है।
• अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह सिर्फ इसके दफनाने की प्रक्रिया के कारण। से है जो नवपाषाणिक-ताम्रपाषाणिक संस्कृति के परिपेक्ष में उत्पन्न होकर एक बड़े क्षेत्र में फैला तथा काफी लंबे समय तक इस संस्कृति का एक अंग था।
• सामान्यत: इसे लोहे से जोड़ते हैं किंतु इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह लौह युग के पहले की संस्कृति हो।
• हल्लूर तथा कुमाराहल्ली जैसे स्थल लौहावस्था संस्कृति की प्रथम अवस्था से जुड़े होते हैं जो लगभग 1300 ई.पू. का समय है।
पूर्वी भारत- प्रतीकात्मक अध्ययन के आधार पर यह पता चला कि यहां को संस्कृति दो नवपाषाणिक सांस्कृतिक क्षेत्रों में विभाजित है पहला भाग बंगाल, बिहार, ओडीशा तथा असम के कुछ क्षेत्रों के मिलने से बना है जो बाद में अन्य कई उप-क्षेत्रों में विभाजित हुआ है। प्रतीकात्मक अध्ययन के अलावा अन्य ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि इतने बड़े क्षेत्र में कृषि होती थी या नहीं।
ओडीशा के कुचाई क्षेत्र में हस्तनिर्मित बर्तन के साथ-साथ पत्थरों की कुछ कुल्हाड़ी तथा बलुआ पत्थर से बना फलक पाया गया है। ओडोशा के ही अन्य क्षेत्र गोलबई सासन में नवपाषाणिक अवशेष जैसे हड्डियों से बने औजार तथा चॉक निर्मित वर्तन काफी संख्या में पाए गए हैं। ये सारा संकलन संभवतः द्वितीय शताब्दी ई.पू. का है।


