अशोक के फूल व्याख्या (Ashoka's flower interpretation)
अशोक के फूल के आधार पर हजारी प्रसाद द्विवेदी की सांस्कृतिक दृष्टि
भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं। ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था; परन्तु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य क का भार लेकर प्रवेश करता है।
वह पहले कहाँ था। उस प्रवेश में नववधू के गृह प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है। फिर एकाएक मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-ही-साथ यह मनोहर पुष्प ज साहित्य के सिंहासन से चुपअशोक के फूल व्याख्याचाप उतार दिया गया। नाम तो लोग बाद में भी स लेते थे, पर उसी प्रकार जिस प्रकार बुद्ध, विक्रमादित्य का। अशोक को जो अ सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था ।
संदर्भ। प्रस्तुत गद्यावतरण और समाज की पाठ्यपुस्तक गत 11 माह में संकलित तथा हिंदी के सुबह खेत निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित 'अशोक के फूल' नामक ललित निबंध से अवतरित है।
प्रसंग इन पंक्तियों में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि अशोक के फूल सबसे अधिक सम्मान कालिदास के द्वारा प्रदान किया गया। को
व्याख्या आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी अशोक के फूल के बारे में बताते हुए कह रहे हैं कि भारतीय साहित्यिक वाङ्मय और भारतीय जीवन में अशोक के फूल का प्रवेश और फिर विलुप्त हो जाना विचित्र नाटकीय स्थिति के सदृश है।
कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। कालिदास के काव्य में यह पुष्प जिस सुन्दरता और सुकुमारता के साथ वर्णित होता है, वैसा उनके पूर्ववर्ती किसी कवि के काव्य में नहीं होता। कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प का वर्णन गरिमापूर्ण, पवित्रतायुक्त और से उसी प्रकार किया है, जिस प्रकार से किसी नववधू का नवीन घर में प्रवेश सुकुमारता शोभायुक्त, गरिमापूर्ण और पवित्रता से होता है।
इस पुष्प को जो गरिमा कालिदास ने अपने साहित्य में प्रदान की वह भारत में मुस्लिम सल्तनत के प्रवेश के साथ-साथ धूमिल होती चली गयी। इसके बाद इस सुन्दर पुष्प की ओर किसी लेखक और कवि ने ध्यान नहीं दिया और यह फूल साहित्य के सिंहासन से उतार कर अलग कर दिया गया। ऐसा भी नहीं है कि लोग इसके नाम से परिचित नहीं थे और इसे महत्त्व नहीं देते थे, लेकिन इसे उसी प्रकार महत्त्व दिया जाता था, जैसे पुर वर्तमान समय में भगवान बुद्ध और विक्रमादित्य को।
आशय यह है कि लोग इनके बारे में अपने पूर्वजों से सुन तो लेते हैं, लेकिन इनके महत्त्व के सम्बन्ध में का जानने का प्रयास नहीं करते। ऐसी ही स्थिति अशोक के फूल की भी है। इसे भी युव कालिदास द्वारा जो सम्मान प्राप्त हुआ वह अभूतपूर्व था, अद्वितीय था।
साहित्यिक सौन्दर्य
(1) अशोक का फूल मात्र कालिदास द्वारा ही अतिशय सम्मानित किया गया, इस भाव की आलंकारिक अभिव्यक्ति हुई है।
(2) भाषा – तत्सम शब्दों से युक्त सहज और सरल खड़ी बोली।
(3) शैली- वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक
(4) वाक्य-विन्यास - सुगठित। आ
(5) शब्द-चयन–विषय के अनुरूप ।
(6) गुण-माधुर्य।
(7) शब्दशक्ति- पुष् अभिधा।
अशोक के फूल' नामक निबन्ध आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिन्तन की परिणति है। भारतीय परम्परा में अशोक के फूल दो प्रकार के होते हैं-
श्वेत एवं लाल पुष्प। श्वेत पुष्प तान्त्रिक क्रियाओं की सिद्धि के लिए उपयोगी हैं, जबकि लाल पुष्प स्मृतिवर्धक माना जाता है।
आलोचक के रूप में द्विवेदी जी ने हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर नवीन दृष्टि से विचार किया। इन्होंने हिन्दी-साहित्य का आदिकाल में नवीन सामग्री के आधार पर शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सूर-साहित्य पर इन्होंने भावपूर्ण आलोचना प्रस्तुत की है। इनके समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न संग्रहों में संग्रहीत हैं।
उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी ने चार उपन्यासों की रचना की। इनके उपन्यास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। इनमें इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा नयी शैली और उनकी मौलिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।


