गोलमेज सम्मेलन
भारतीय गोलमेज सम्मेलन के तीन अधिवेशन हुए जिसे प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय गोलमेज सम्मेलन कहा जाना गलत है। प्रथम अधिवेशन (नवंबर 12, 1930 ई. से जनवरी 19, 1931 ई.) साइमन कमीशन (जिसे मिस्टर बाल्डविन के नेतृत्व वाली कंजरवेटिव मंत्रिमंडल ने 1919 ई. के सुधार कार्यों तथा भारत के लिए बाद के संवैधानिक सुधारों पर रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त किया था।
जिसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर रैम्जे मैकडोनाल्ड (जिनकी लेबर पार्टी 1929 ई. में सत्ता में आई थी) को 16 अक्टूबर 1929 ई. को भारत से एक पत्र लिखकर भारत के लिए संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर अंतिम निर्णय लेने के लिए ब्रिटिश भारत तथा भारतीय राज्यों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन आयोजित करने का आग्रह किया था। उसका सुझाव ब्रिटिश मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार कर लिया गया तथा भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने प्रसिद्ध ‘दीपावली घोषणा' (31 अक्टूबर, 1929 ई.) को घोषित किया। इसके अनुसार ब्रिटिश नीति का उद्देश्य भारत को स्वतंत्र उपनिवेश देना तथा साइमन कमीशन के रिपोर्ट के बाद लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित करना था।
इसमें ब्रिटेन के तीनों राजनैतिक दलों के 16 प्रतिनिधि भारतीय राज्यों के 16 प्रतिनिधि तथा ब्रिटिश भारत के 57 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। साइमन कमीशन के रिपोर्ट से असंतुष्ट कांग्रेस ने उस सम्मेलन में भाग नहीं लिया किंतु अन्य पार्टियों के सदस्यों, जैसे-मुस्लिम लीग के मुहम्मद अली, मुहम्मद शफी, जिन्ना, आगा खान तथा फजल-उल-हक हिंदू महासभा के मुंजे तथा जयकर; इंडियन लिबरल फेडरेशन के तेज बहादुर सप्रू. सी.वाई. चिंतामणि, एम. आर. जयकर तथा श्रीनिवास शास्त्री; दलित वर्ग के प्रतिनिधि बी. आर. अंबेडकर थे, ने उसमें भाग लिया।
भारतीय रियासतों के एक कमजोर परंतु जिम्मेदार संघ यानी केंद्र सरकार की सहमति के बाद इस सम्मेलन को समाप्ति हो गई (अंग्रेजों ने यह सुनिश्चित किया कि केंद्रीय दायित्व के वादे में कई प्रकार के बंधन हों) से लेकिन अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर सांप्रदायिक दलों में कोई समझौता नहीं हुआ।


