बाबा (पिता)
स्वरचित-कविता अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर उत्तर प्रदेश
थोड़ा थोड़ा रोना चाहूँ,
बातें बहुत कुछ बाबा
तुम से कहना चाहूँ।
नहीं थे जब संक्षम हम तुम्हें कुछ देने में
बाबा तुम देते थे तब आशमा मुठ्ठी में।
तेरे हाथों की रोटी चीनी
खाती थी बैठ तेरे गोद में
उस पल को जीना फिर चाहूँ
अपने घर के आंगन में।
विशाल हृदय तुम्हारा था,
नन्हें कदम हमारें थे
जहाँ तक नजरें हमारी जाती
वह सब कुछ हमारा था।
बाबा अनकही उन बातों पे
रोना अक्सर आता है
तेरे साथ साथ चलने को मन बहुत करता है
आखो की भाषा से
अम्मा अभी भी तुम से बतियाती है
हमें देखकर दूख अपना पल भर में छुपाती है।
दबी दबी सी हल्की हंसी मै भी हंस लेती हूँ
मूर्ख स्वयं को बनाके
मायके के सीढ़ी चढ़ जाती हूँ।
शब्द नहीं अल्फाज नहीं
कैसे चीख और चिल्लाहट करके
मन हल्का कर लूँ
नियति के खेल को कैसे
मैं भूल जाऊं।
जिदंगी के आशियाने में
बाबा फिर से आंव ना
अपनी तस्वीर पे चढी माला को झूठा कह हटा दो ना।
देखो बाबा
मैं रोती नहीं
राज दुलारी बेटी हूँ तेरी
बस थोड़ा थोड़ा रोना चाहूँ
बातें बहुत कुछ बाबा
तुम से कहना चाहूँ।
