प्राचीन भारत में दासता पर टिप्पणी
प्राचीन भारत में दास प्रथा भारत में दास प्रथा का इतिहास अत्यन्त पुरातन है। संभव है, यद्यपि स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिले हैं. इसका आरम्भ प्रागैतिहासिक काल से हो गया हो। मार्शल महोदय का विचार है कि मोहनजोदड़ो में बड़े-बड़े भवनों में जो छोटे-छोटे कमरे मिले हैं इसमें सेवक या दास लोग रहते होंगे। प्राचीन भारत में दास प्रथा के साक्ष्य अवश्य मिले हैं लेकिन वह प्रथा पाश्चात्य दास प्रथा से सर्वथा भिन्न थी। प्राचीन भारत में दास प्रथा का विवरण निम्नलिखित बिन्दुओं पर देखा जा सकता है।
ऋग्वेद में दास: ऋग्वेद में सर्वप्रथम दास शब्द का प्रयोग मिलता है। इसमें वे इनके (वैदिक लोगों) प्रतिद्वन्द्वी या शत्रु में वर्णित है। दास कहे जाने वाले लोग वैदिक लोगों से सर्वथा और हर दृष्टि से भिन्न थे। इनके लिए अनेक संज्ञाएं ॠग्वेद में पयुक्त है। सम्भव है ये दास पराजित होकर इनके दास या सेवक बने हो। एक स्थल पर त्रसदस्यु को पचास युवतियों की भेंट देते हुए वर्णित किया गया है। सम्भवतः इन्हें भेंट देने की प्रथा थी।
उत्तरवैदिक युग में दास: उत्तर वैदिक साहित्यों में स्पष्ट रूप से दास-दासियों का उल्लेख है। तैतिरिय संहिता में दासियों के पानी भरने का उल्लेख प्राप्त होता है। इसी ग्रन्थ में दास-दासियों को भेंट में देने का भी वर्णन है। भेंट में दास-दासियों को देने की प्रथा तो अब सामान्य सी हो गयी थी। ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदों में इसके ढेरों उल्लेख आए है। इनसे प्रतीत होता है कि उपनिषदों के काल में यह प्रथा निर्बाध रूप से समाज में प्रचलित और लोकप्रिय हो चुकी थी। सूत्रों में भी दासों का वर्णन मिलता है। गौतम और बौधायन को धर्म सूत्रों में अदिशित किया गया है कि दास उच्च वर्गों के सवा में सदा लगे रहें क्योंकि यही उनका प्रधान धर्म है। इस काल में दास प्रायः घरेलू कार्यों से ही सम्ब) थे। इन ग्रन्थों से हमें यह सूचना नहीं मिल पाती कि समाज में उनसे कैसा व्यवहार किया जाता था।
महाकाव्यों में दास प्रथा: महाभारत में हमें दास प्रथा के अनेकानेक साक्ष्य प्राप्त होते हैं। उन्हें भेंट का सामान समझाने की मानसिकता के सर्वत्र साक्ष्य मिलते हैं। बहुत से उल्लेख उन्हें भेंट में देने के प्राप्त होते हैं। राजसूय यज्ञ के बाद युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मणों को तीस-तीस दासियों प्रदान की थी। ऐसे ढेरों उल्लेख बिखरे हुए है। रामायण भी इस प्रकार के साक्ष्यों से अछूता नहीं है। अतः दास प्रथा का इस युग में होना सिद्ध है।
दास प्रायः घरेलू कार्य ही करते थे उनके साथ अमानवीय व्यवहार की कहीं सूचना नहीं मिलती।
बौद्ध एवं परवर्ती काल में दास: बौद्धयुग में दासों के कार्यों को हम बहुत सारे क्षेत्रों में फैला हुआ पाते हैं। इस युग में दास कृषि, सेना व्यापार और गृहकार्य सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुके थे। मैना में कार्य करने वाले दाम दसक पुल जाते थे। ये सामानों को होने आदि का कार्य करते थे। बौद्ध ग्रन्थ मन्दिझमनिकाय और दीपनिकाय में दास प्रथा का उल्लेख हमें मिलता है। जातकों में भी हमें दास के अनेक विवरण मिलते हैं। दासों के क्रय-विक्रय सेवाकार्य, भेंट उपहार में देने आदि का विवरण हमें बहुतायत मिलता है। बौद्धयुग में और उसके बाद भी हमें दासों के विवरण प्राप्त होते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार की सूचना नहीं प्राप्त होती।
दास मौर्य युग: में दास प्रथा अत्यन्त प्रौढ़ स्थिति में दिखाई देती है। इस समय तक दासों के लिए भी अनेकानेक नियम बन गये थे। यह भी निश्चित हो गया कि कौन दास बनाया जा सकता है और कौन नहीं। कौटिल्य ने व्यवस्था दी है कि यदि म्लेच्छ अपनी सन्तानों को बेंचते या प्रदान करते हैं तो वे दण्डनीय नहीं है लेकिन आर्य दास नहीं बनाए जा सकते।
इससे स्पष्ट है कि म्लेच्छ की सन्तान दास होती थी लेकिन आर्यों को सन्तान दास नहीं बनायी जा सकती थी। मेगस्थनीज ने स्पष्ट लिखा कि भारत में दास नहीं है। वास्तव में उसे यूनान की भांति अनुदार पूर्ण और अमानवीय दास प्रथा उसने नहीं देखी थी। भारत में इस समय निश्चित रूप से अत्यन्त सहृदयता पूर्वकः व्यवहार किया जाता था। उनके सुख सुविधा, भोजन, शयन का ध्यान रखा जाता था। सम्राट अशोक ने नवें शिलालेख में प्रजा को निर्देश दिया है कि वे अपने दास और दासियों के साथ उचित व्यवहार करें।
स्मृतियों में दास प्रथा प्रायः सभी स्मृतियां दास प्रथा का उल्लेख करती है। मनु ने शूद्रों से दास कर्म कराने का निर्देश दिया है। नारद, याज्ञवल्क्य कात्यायन आदि स्मृति कारों ने दासों का विशद विवरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने दासों के प्रकार, उनके कार्य, स्वामी द्वारा किए जाने वाले उनके प्रतिव्यवहार तथा उनकी दासता से मुक्ति आदि सभी पक्षों पर विस्तार से चर्चा प्रस्तुत की है। इस युग में भी
दास-दासियों के साथ व्यवहार: अमानवीय स्तर तक नहीं गया था। वास्तव में दास-दासियों के साथ व्यवहार उनके स्वामी की प्रकृति पर निर्भर था। दासों के प्रति व्यवहार दासी के प्रति किया जाने वाला व्यवहार भारत में कभी पाश्चात्य दास प्रथा की भांति नहीं हुआ। उनके साथ होने वाला व्यवहार उनके स्वामी के प्रकृति पर निर्भर था। यदि स्वामी अच्छा, सरल और सभ्य होता था तो वह दासों से भी उदारता पूर्ण व्यवहार करता था।
यदि वह नीच था तो नीचता का व्यवहार करता था। इसका प्रमाण हमें शुद्धता के मृच्छकटिकय नाटक से भी मिलता है। जातकों में हम दासों को भाण्डागरिक जैसे पदों पर भी आसीन पाते हैं। कुछेक जातकों में दास-दासियों को पीटने के भी उल्लेख प्राप्त होते है। इसके उदाहरण तक्क जातक, वेसत्तर जातक, अंगुतर निकाय आदि में प्राप्त होते हैं। लेकिन जातकों में दास दासियों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार को उल्लेख भी बहुतायत मिलते हैं।


