विश्व फोटोग्राफी दिवस
चित्र और चरित्र दोनों को आंका जाता है तब इंसान की पहचान होती है। मैंने अपने जीवन के 25 वर्ष लेखन कार्य मे बिता दिए। शौक तो लिखने का 10 क्लास में ही जाग गया था स्कूल की वार्षिक पत्रिकाओं में अपने हिसाब की कविताएं लिखी थी। तब शब्दों का चयन उतने बढ़िया तरीके से नहीं आता था धीरे-धीरे परिपक्व मन होता गया और लेखन में शब्दों का विस्तार होता गया। पहले समय में शेरों शायरी बेशुमार डायरियों मे लिखा करती थी आज़ जब उन डायरियों को उठाती हूं तो हँसी आती है। कुछ डायरिया तो मैंने अपनी स्कूल की सखियों को दे दी।
चित्रकारी का बहुत शौक था वैसा नहीं जैसे मंजे कलाकार किसी भी इंसान की आकृतियों को उकेर देते हैं बल्कि बायोलॉजी प्रेक्टिकल मे मिलने वालों चित्रों को हूबहू बना देती थी और स्कूल की बहुत सी सखियों का प्रेक्टिकल कार्य मैं कर देती थी ताकि मेरा हाथ उन चित्रकारी जो एक पेंसिल से उकेरी गई अनगिनत प्राणियों को जीवित रूप दे कर पारंगत हो जाए। अफसोस मेरी प्रेक्टिकल फाइल स्कूल लैब से चोरी हो गई वर्ना आज उन्हें जरूर दिखाती। उसके बाद कॉलेज फिर शादी लेखन कार्य छूटा। फिर फेसबुक के माध्यम से सभी जुड़े। दीदी, छोटी बहने, सखियाँ ईन सब के बीच उतार चढ़ाव आने के बाबजूद मैं मजबूत रही और पता नहीं चला मेरी किताबे भी छ्प गई।
मध्यमवर्गीय होने के कारण मैंने निःशुल्क किताबें ही छपवाई क्योंकि बिना पैसों के कार्य पसंद है मुझे। आप सब के सामने एक छोटी सी पहचान है एक साधारण से लेखिका फिर पत्रकार ये अनुभव भी मैंने जिए। सम्मान बराबर दोस्तों का किया उन्हें सिर का ताज बनाया अंत में कुछ नहीं पाया। एक माँ एक पत्नी बन कर सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए जीवन काल के 43 साल पूर्ण भी हो गये। फिर शारीरिक और मानसिक कष्ट से जूझते हुए एक फोटो कल क्लिक की। आगे की जिंदगी साधारण तरीके से बीत जाए यही बहुत है। बस एक सपना पूर्ण करना है सभी के साथ भारत भ्रमण का
विश्व फोटोग्राफी दिवस पर मुझे मुझसे अच्छा चित्र कहीं नहीं मिला
"मैं खुद की नजरो में बेहतर हूं
अपनी नजरों में ईमानदार रहूंगी।
भले ही लाख आए तूफान,
अपने लक्ष्य को नहीं भूलूंगी।


