हिंदी भाषा एवं नागरी लिपि पर्याय है।
लेख डॉ. प्रभु चौधरी
भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा हिन्दी है और इसकी लिपि देवनागरी। इस लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से हुआ है। ब्राह्मी लिपि विश्व की प्राचीन लिपियों में से एक है। इसके प्राचीनतन लेख ई. पूर्व पाँचवी शताब्दी तक के उपलब्ध होते हैं। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेखों में सर्वप्रथम ब्राह्मी के दर्शन होते हैं, किन्तु साहगौरापट्ट, पिडावा और वर्ली के लेखों से इस लिपि की प्राचीनता उत्तर भारत में नवीं शताब्दी के अंतिम चरण में उपलब्ध थी ।
देवनागरी लिपि के नामकरण के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं। जैसे देवताओं की प्रतिमाओं के बनने से पूर्व उनके सांकेतिक चिन्ह, जिसे देवनागर कहते हैं पूजे जाते थे। कालान्तर में यही देव चिन्ह लिपि चिन्ह बन गए और उन पर आधारित लिपि देवनागरी लिपि के नाम से पुकारी जाने लगी। कुछ लोगों का मत है कि प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र को नगर एवं पाटलीपुत्र के सम्राट चंद्रगुप्त को देव कहा जाता था। इन दोनों के नाम पर नागरी लिपि को देवनागरी कहकर पुकारा जाने लगा। कुछ लोग नागर का संबंध गुजरात के नागर ब्राह्मण से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि नागर ब्राह्मणों से प्रचलित होने के कारण ही इसका नाम नागरी पड़ा। एक अन्य मतानुसार तांत्रिक ग्रंथों में बने कुछ चिन्हों को देवनागर कहा जाता था। नागरी के अनेक अक्षर इन चिन्हों से मिलते जुलते लगते हैं इसलिए इस लिपि को देवनागरी कहा जाने लगा। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार, मध्ययुग की एक अन्य स्थापत्य शैली का नाम नागर था, जिसकी आकृतियाँ चौकोर होती थीं। नागर लिपि के अधिकांश अक्षर चूँकि चौकोर है, इसी कारण इसे नागर या नागरिक कहा गया। इसके बाद सम्मानसूचक देव शब्द जुड़ जाने से इसका नाम देवनागरी हो गया। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस लिपि का प्रचार देवनगर (काशी) में हुआ। इसलिए इसका नाम देवनागरी पड़ा। नगरी में प्रचलित होने के कारण यह लिपि नागरी लिपि के नाम से पुकारी जाने लगी। यह भी मान्यता मिलती है कि कुछ विद्वान इस लिपि के कारण नागरी नाम स्वीकारते हैं ।
भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा हिन्दी है और इसकी लिपि देवनागरी। इस लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से हुआ है । ब्राह्मी लिपि विश्व की प्राचीन लिपियों में से एक है। इसके प्राचीनतम लेख ई. पूर्व पांचवी शताब्दी तक के उपलब्ध होते हैं। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेखों में सर्वप्रथम ब्राह्मी वेद के दर्शन होते हैं। किन्तु साहगीरापट्ट पिड़ावा और वर्ली के लेखों से इस लिपि की प्राचीनता उत्तर भारत में नवीं शताब्दी के अंतिम चरण में भी उपलब्ध थी। इसी का नाम दक्षिण भारत में आठवीं शताब्दी में नंदनागरी था। भारत में पंद्रहवी शताब्दी तक प्राचीन नागरी का ही प्रचार था और आधुनिक नागरी लिपि का विकास सोलहवीं शताब्दी में हुआ। छठी शताब्दी में गुप्त लिपि से सिद्ध मंत्रिका लिपि बनी। सातवीं और आठवीं शताब्दी में ब्राह्मी से कुटिल लिपि का विकास हुआ देवनागरी का विकास भारत में सातवीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो चुका था। गुजरात के राजा जयभट्ट के समय में देवनागरी लिपि का सर्वप्रथम प्रयोग सातवी आठवीं शताब्दी के शिलालेख से मिलता है।
आठवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं की आज्ञा से देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती थी। तथा नवीं शताब्दी में बड़ौदा में राजा ध्रुव की राजाज्ञाएँ और आदेश इसी लिपि में मिलते हैं। दक्षिण भारत में भी कोंकण और विजयनगर में देवनागरी का प्रयोग किया जाता था। महाराष्ट्र में यह नागरी लिपि बालबोध के नाम से प्रचलित हुई। स्पष्ट है कि देवनागरी से मैथिली, गौडी आदि लिपियों का विकास हुआ है ।
हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि का चोली दामन का संबंध है। समस्त भाषाओं का गुजरात मूल रूप उच्चरित ध्वनियों पर आधारित है । मानव मन के भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति शब्दों व वाक्यों द्वारा होती है। श्रुत ध्वनियों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए रेखाचित्रों तथा चिन्हों का प्रयोग होता रहा है। इन्हीं का परिवर्तित स्वरूप ध्वनियों को निश्चित क्रमानुसार लिखित रूप को सार्थक बनाते हुए प्रस्तुत करना ही लिपिबद्ध करना होता है। भाषा और लिपि मनुष्य के भावों व विचारों के सम्प्रेषण के माध्यम है। लिपि और भाषा का अन्योन्याश्रित संबंध है। भाषा में जो ध्वनियाँ श्रव्य रूप में प्रस्तुत होती हैं वही लिपि में दृश्य रूप में प्रयुक्त होती हैं। भाषा सदैव समय व स्थान की सीमाओं में सीमित रहती है जबकि लिपि समय और सीमाओं से परे भी युग समय व स्थान पर पहुँच कर अपना अस्तित्व प्रस्तुत करती हैं। मौखिक भाषा को लिपि द्वारा ही लिखित रूप प्रदान किया जाता है।
देवनागरी लिपि भारत की प्रमुख लिपि मानी जाती है। हिन्दी भाषा की समस्त बोलियाँ जैसे बज अवधि, भोजपुरी, नेपाली, गुजराती इसी भाषा में लिखी जाती है। देवनागरी वा नागरी लिपि की उत्पत्ति भारत की प्राचीन भाषा ब्राह्मी से मानी जाती हैं। गुप्त काल की गुप्त लिपि से पूर्व ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था । लगभग आठवीं शताब्दी में प्राचीन नागरी का आविर्भाव हुआ । अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग हुआ है। देवनागरी को लोक नागरी और हिन्दी लिपि भी कहा गया है। के नागर पण्डितों का एक वर्ग था। उन्हीं के नाम से नागरी शब्द का उद्गम हुआ और देव शब्द संस्कृत भाषा की देन है। इस प्रकार देवनागरी का प्रचलन हुआ।
भारत भूमि पर पल्लवित समस्त भाषाओं को जीवन्त रखने में देवनागरी लिपि का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वही लिपि है जिसने हिन्दी भाषा को प्राणवान बनाते हुए हमारी सांस्कृ तिक विरासत को अक्षुण्य बनाये रखने में सहयोग किया। समूचे देश की गौरवमयी परम्पराओं, गाथाओं तथा सांस्कृतिक अवधारणाओं को गतिमान करने में सदैव सक्रियता दिखाई है। हमारी राष्ट्रीय गरिमा का परिचय नागरी लिपि पर आधत है। संस्कृत, अवधि, व्रज, हिन्दी, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं का साहित्य भी नागरी लिपि द्वारा ही अनुप्राणित हुआ है। डॉ. मनोज कुमार पाण्डेय ने लिखा है कि भाषा के बिना यदि संस्कृति पंगु है तो संस्कृति के अभाव में भाषा अंधी है।"
मौखिक भाषा या नाद का चित्रात्मक स्वरूप लिपि कहलाता है। लिपि द्वारा ही हमारी सभ्यता और संस्कृति को एक पीढ़ी से आगे की पीढ़ी में हस्तान्तरित किया जाता है। भारतीय "भाषाओं के लिए एक ही सामान्य लिपि को अपनाना अधिक श्रेयस्कर है। इससे राष्ट्रीय भावात्मक एकता को प्रोत्साहन तो मिलेगा ही साथ ही गौरवमय परम्पराओं को भी बल मिलेगा। हमारे देश का जिस प्रकार एक राष्ट्रगीत एक राष्ट्रध्वज है उसी प्रकार सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए एक ही लिपि सहजता पूर्वक अपनायी जा सकती है और वह है देवनागरी लिपि " ऐसा होने पर समूचा राष्ट्र एकता के सूत्र में बंधकर परस्पर सहयोग, सहानुभूति संवेदना और भावात्मक सुदृढ बनेगा।
देवनागरी के नामकरण पर विभिन्न मत । है नारी का संबंध गुजरात के नागर ब्राह्मणों से भी माना जाता है, इन्हीं नागर ब्राह्मणों से प्रचलित होने के कारण इस लिपि का नाम नागरी पड़ा। यह भी मान्यता है कि प्राचीनकाल में पाटलीपुत्र और वहाँ के सम्राट चंद्रगुप्त को देव कहते थे, इन्हीं के नाम पर नागरी लिपि को देवनागरी नाम से अभिहित किया गया। ऐसा भी माना जाता है कि नागरी के अनेक अक्षर तांत्रिक ग्रन्थों में बने कुछ चिन्हों से मिलते-जुलते हैं। इन चिन्हों को देवनागर कहा जाता है और इसी कारण इस लिपि को देवनागरी कहा जाने लगा। यह भी माना जाता है कि देवताओं की मूर्तियां बनने से पूर्व उनके सांकेतिक चिन्ह पूजे जाते थे। जिन्हें देवनागर कहते थे बाद में इन्हीं चिन्हों ने लिपि का रूप धारण किया जिसे देवनागरी कहा गया । भाषा शास्त्री डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार मध्य युग की एक स्थापत्य शैली का नाम नागर था, जिसको आकृतियाँ चौकोर होती थीं। नागरी लिपि के अधिकांश अक्षर चूँकि चौकोर हैं, इसी कारण इसे नागर या नागरिक कहा गया है कि बाद में देव शब्द इससे जुड़ा। देवनगर (काशी) में इस लिपि का प्रचार होने से भी इसे देवनागरी कहा जाने लगा। यह भी माना जाता है कि नगरों में प्रचलित होने के कारण इस लिपि को नागरी लिपि कहा गया।
नागरी या देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से हुआ है इसलिए इससे गुजराती, महाजनी, गौडी, कैथी, मैथली, बंगला आदि लिपियों का विकास हुआ है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि यह विश्व की प्राचीनतम लिपियों में से एक है। इस लिपि से संसार की अनेक प्रमुख लिपियों का विकास हुआ हैं। यह लिपि, हमारे देश की श्रेष्ठ, व्यापक, राष्ट्रीय वैज्ञानिक लिपि है। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर विचार करने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि एक वैज्ञानिक लिपि में या आदर्श लिपि में निम्नलिखित गुण होना चाहिए।
आदर्श लिपि के लिए यह आवश्यक है कि उसमें ध्वनि और लिपि में साम्य पाया जाता हैं।
अतः अर्थात् जो बोला जाए वही लिखा जाए और जो लिखा जाए वही बोला जाए। एक ध्वनि के लिए एक ही लिपिचिन्ह हो अर्थात् ध्वनि और उसके संकेतो में निश्चितता हो । आदर्श लिपि में किसी भाषाओं की समग्र ध्वनियों को अंकित करने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए। लिपि का सुपाठ्य और संदेहरहित होना भी आवश्यक है। एक संकेत में दूसरे का भ्रम
नहीं होना चाहिये। सौंदर्य भी एक महत्वपूर्ण है, जिसका आदर्श लिपि में होना चाहिये ।। यांत्रिक सौंदर्य भी वैज्ञानिक लिपि के लिए आवश्यक है, जिससे टंकण या मुद्रण में सुविधा हो आदर्श लिपि के लिए यह भी अनिवार्य है कि वह शीघ्रता से लिखी जा सके, क्योंकि आज 1
के वैज्ञानिक युग में आशु लेखन की सुविधा आवश्यक हैं। उपर्युक्त सभी गुण देवनागरी लिपि में मिलते हैं। इसमें ध्वनि एवं लिपि में पूर्ण साम्य है। अर्थात् जो बोला जाता है वहीं लिखा जाता है। हिन्दी में अनेक शब्द हैं जिनको रोमन में लिखने में अर्थ का अनर्थ हो जाता है। जैसे पढ़ना और पड़ना, बढ़ा और बड़ा इन शब्द युग्मों के अर्थ अलग-अलग हैं। रोमन में लिखने से इनका अंतर समाप्त हो जाएगा। इसका उच्चारण भी भिन्न तरीके से होगा। अंग्रेजी में राम को रामा तथा कम को ब्रह्मा हो जाता है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी भाषस के प्राकाण्ड पण्डित और शिल्प की हिन्दी जब उनके द्वारा सरस्वती पत्रिका का सम्पादन हुआ करता था तब हिन्दी भाषा के क्षेत्र में विशेष प्रगतिशील प्रयास हुए हैं। देश के कई साहित्यकार द्विवेदी के निकट रहकर इस दिशा में प्रचार प्रसार करते रहे। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने भी भारत भारती के माध्यम से भारतीय जनमानस को आन्दोलित किया है और वैचारिक क्रांति का अलख जगाया है। इसी कारण उन्हें राष्ट्र कवि के रूप में घोषित किया गया था।
भारत विविधताओं का देश है। इसमें अनेक भाषाएँ, धर्म, सम्प्रदाय तथा जातियों के लोग निवास करते हैं। जिनकी अनेक भाषाएँ और सांस्कृतिक परम्पराएं हैं। समस्त विविधताओं के होते हुए भी हम सब एक हैं फिर भी धर्म प्रान्त भाषा, जाति और सम्प्रदाय के भेदभाव को दूर करना हमारी एकता को सुदृढ़ करना तथा जनमानस में राष्ट्रप्रेम की जोत जगाना आवश्यक है। इसके लिए देवनागरी लिपि समूचे देशवासियों को मणिमाला की तरह एक सूत्र में बांधे रखने में सक्षम है। देश के प्रत्येक भूभाग में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में यदि देवनागरी लिपि का प्रचलन हो तो देशवासियों की निकटता बढ़ेगी और भावात्मक एकता को संबल मिलेगा। राष्ट्रीय वैज्ञानिक लिपि है। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर विचार करने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि एक वैज्ञानिक लिपि में या आदर्श लिपि में निम्नलिखित गुण होना चाहिए।
आदर्श लिपि के लिए यह आवश्यक है कि उसमें ध्वनि और लिपि में साम्य पाया जाये.
है। अतः अर्थात् जो बोला जाए वहीं लिखा जाए और जो लिखा जाए वही बोला जाए। एक ध्वनि के लिए एक ही लिपिचिन्ह हो अर्थात् ध्वनि और उसके संकेतो में निश्चितता हो । आदर्श लिपि में किसी भाषाओं की समग्र ध्वनियों को अंकित करने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए। लिपि का सुपाठ्य और संदेहरहित होना भी आवश्यक है एक संकेत में दूसरे का भ्रम नहीं होना चाहिये। सौंदर्य भी एक महत्वपूर्ण है, जिसका आदर्श लिपि में होना चाहिये।
यांत्रिक सौंदर्य भी वैज्ञानिक लिपि के लिए आवश्यक है, जिससे टंकण या मुद्रण में सुविधा हो । आदर्श लिपि के लिए यह भी अनिवार्य है कि वह शीघ्रता से लिखी जा सके, क्योंकि आज के वैज्ञानिक युग में आशु लेखन की सुविधा आवश्यक है। उपर्युक्त सभी गुण देवनागरी लिपि में मिलते हैं। इसमें ध्वनि एवं लिपि में पूर्ण साम्य है। अर्थात् जो बोला जाता है वहीं लिखा जाता है। हिन्दी में अनेक शब्द हैं जिनको रोमन में लिखने में अर्थ का अनर्थ हो जाता है। जैसे पढ़ना और पड़ना, बढ़ा और बड़ा इन शब्द युग्मों के अर्थ अलग-अलग हैं। रोमन में लिखने से इनका अंतर समाप्त हो जाएगा। इसका उच्चारण भी भिन्न तरीके से होगा। अंग्रेजी में राम को रामा तथा कम को ब्रह्मा हो जाता है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी भाषस के प्राकाण्ड पण्डित और शिल्प की हिन्दी जब उनके द्वारा सरस्वती पत्रिका का सम्पादन हुआ करता था तब हिन्दी भाषा के क्षेत्र में विशेष प्रगतिशील प्रयास हुए हैं। देश के कई साहित्यकार द्विवेदी के निकट रहकर इस दिशा में प्रचार प्रसार करते रहे। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने भी भारत भारती के माध्यम से भारतीय जनमानस को आन्दोलित किया है और वैचारिक क्रांति का अलख जगाया है। इसी कारण उन्हें राष्ट्र कवि के रूप में घोषित किया गया था।
भारत विविधताओं का देश है। इसमें अनेक भाषाएँ, धर्म, सम्प्रदाय तथा जातियों के लोग निवास करते हैं। जिनकी अनेक भाषाएँ और सांस्कृतिक परम्पराएं हैं। समस्त विविधताओं के होते हुए भी हम सब एक हैं फिर भी धर्म प्रान्त भाषा, जाति और सम्प्रदाय के भेदभाव को दूर करना हमारी एकता को सुदृढ़ करना तथा जनमानस में राष्ट्रप्रेम की जोत जगाना आवश्यक है। इसके लिए देवनागरी लिपि समूचे देशवासियों को मणिमाला की तरह एक सूत्र में बांधे रखने में सक्षम है। देश के प्रत्येक भूभाग में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में यदि देवनागरी लिपि का प्रचलन हो तो देशवासियों की निकटता बढ़ेगी और भावात्मक एकता को संबल मिलेगा।
प्रत्येक भूभाग की भाषा को यदि नागरी लिपि का आश्रय मिल जायेगा तो सभी देश वासी एक दूसरे की सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं से सुपरिचित रहकर परस्पर संबंधों को प्रगाढ़ बना सकेंगे जो राष्ट्रीय समृद्धि और समानता के लिए भी आवश्यक है। किसी भी भाषा में व्यक्त विचारों का या लिखित प्रतिमानों को यदि पढ़ नहीं सकते तो निकटता का आविर्भाव संभव नहीं हो सकता अतः लिपि की समानता का होना राष्ट्र व समाज के लिए कल्याणकारी और हितकर होगा। यदि राष्ट्र के नागरिकों में व्याप्त दूरियों, न्यूनताओं और वैचारिक भावनाओं को सुदृढ़ करना है तो नागरी लिपि को सम्पर्क " लिपि के रूप में अपनाया जाना चाहिए। इससे देशवासी एक दूसरे के अति निकट आयेंगे और दूसरे के दुख दर्द में सहभागी बन सकेंगें। इस संबंध में डॉ. किशोर काबरा ने कहा है देवनागरी लिपि प्रेम की लिपि है। यह स्नेह और ज्ञान दोनों का वितरण कर सकती है। यह उत्तर को दक्षिण से और पूर्व को पश्चिम से ही नहीं भारत को एशिया से जोड़ सकती है। "
अतः यह स्पष्ट है कि नागरी लिपि श्रेष्ठतम होने के साथ ही राष्ट्र की एकता को बढ़ाने में भी सहायक है। यह भी आश्चर्य है कि राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी और राष्ट्र लिपि के रूप में देवनागरी को समर्थन देने बंगाल के समाज सुधारक एवं ब्रह्म समाज के संस्थापक राजाराम मोहन राय थे। जिन्होंने बंगदूत में बंगला, हिन्दी तथा अंग्रेजी की रचनाओं को समान रूप से प्रकाशित करते हुए भी देवनागरी को प्राथमिकता देते रहे । बंकिम चन्द्र चटर्जी, रविन्द्र नाथ टैगोर तथा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी हिन्दी को ही राष्ट्र भाषा के रूप में चेतना के लिए जिन साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा है उनमें मुंशी प्रेम चन्द जी का विशेष नाम लिया जाता है। आचार्य द्विवेदी जी की प्रेरणा से ही गुप्तजी ने खड़ी बोली को अपने काव्य ग्रंथों की रचना का माध्यम बनाया तत्कालीन सरस्वती पत्रिका के माध्यम से भी आचार्य जी ने हिन्दी भाषा को विशेष प्रश्रय दिया तथा अंग्रेजों की भाषा नीति को समझते हुए बताया कि " अंग्रेज भारतीय उपभाषाओं, बोलियों को परस्पर लड़ाकर अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को स्थापित कराने में सर्वप्रथम रोमन लिपि को प्राथमिकता देने लगे थे।
भारत गाँवों का देश है हमारी ग्राम्य संस्कृति बहुत समृद्ध एवं सम्पन्न है। गाँवों की लोक संस्कृति, बोलियाँ, लोककथाएँ, गीत संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों ने हिन्दी की विकास यात्रा में पूरा सहयोग किया है। हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व को संभालने वाले महापुरूषों, साहित्यकारों, कलाकारों और जन प्रतिनिधियों ने यह स्वीकार किया है कि देवनागरी लिपि समस्त भारतीय लिपियों में श्रेष्ठ होने के कारण समूचे राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बढ़ाने में सक्षम है। इसी लिपि के द्वारा भारतीयों में संगठन शक्ति, एकता, राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का विकास हो सकता है। राष्ट्र भाषा हिन्दी और देवनागरी लिपि राष्ट्र के लिए श्रेयस्कर है। विष्णु प्रिया के सम्पादक डॉ. सुब्रमण्यम अपने पत्र के मुख पृष्ठ पर प्रकाशित करते रहे हैं कि " बोली के मोह में पड़कर निज भाषा का महत्व न भूलें । निज भाषा के मोह में पड़कर हिन्दी भाषा का स्वीकार करने की इच्छा प्रकट की थी। राष्ट्रीय स्थान न भूलें ।
हिन्दी भाषा की महत्ता इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि आज अमेरिका में भी लगभग 100 विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन कराया जाता है। ग्रियर्सन ने कहा है " हिन्दी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणी है हिन्दी का कलेजा एक माँ की तरह उदार है इसमें कितनी ही भाषाओं के शब्द आकर समा गये। बिना संस्क व उर्दू के शब्दों के तो हिन्दी की कल्पना तक नहीं कर सकते। हिन्दी हमारी माँ है तो उर्दू मौसी है। अंग्रेजी विदेशी माँ की उपेक्षा करके दूसरों को संवारने वाले न अच्छे बेटे हो सकते हैं और न समझदार इंसान । हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा है यह हमारे देश की संस्कृति, धर्म व राजनीति की भाषा है जो समूचे देश में एकता चेतना तथा देश प्रेम की भावना को संबल प्रदान करने वाली भाषा है जिसका आधार स्तम्भ देवनागरी लिपि है।


